वैसे तो ये पोस्ट हमें दो दिन बाद लिखनी चाहिये थी लेकिन हमें मालूम है कि आज नही लिख पाये तो फिर शायद ही इसका नंबर आयेगा। इसलिये आज को ही २६ तारीख समझ आप भी ये पोस्ट पढ लीजिये।

कभी सोचा नही था कि टाईप कर कर के कुछ पोस्ट करने का सिलसिला यूँ २ साल तक जारी रहेगा। आज भी याद है जब हिन्दी के चिट्ठे की शुरूआत करते हुए पहली पोस्ट लिखी थी, अगले ही दिन अचानक आये किसी तूफान के जैसा मंजर हमारी उस पहली पोस्ट में नजर आया यानि कि जम के टिप्पणीवृष्टि हुई थी। अपने को आज तक समझ ही नही आया कि अचानक इतने सारे हिन्दी लिखने वालों को उस वक्त कैसे पता चल गया क्योंकि नारद जी का तो तब जन्म ही नही हुआ था। खैर तब हिन्दी चिट्ठे लिखने वाले बहुत कम थे और उनमें से थोडे बहुत ही अभी सक्रिय हैं कुछ ईद का चांद बन गये हैं और कुछ का तो वैसे ही पता नही चल पा रहा जैसे लादेन कहाँ किस की पीठ पर लदा लदा फिर रहा ये पता नही चल पा रहा। अगर आप ये सोच रहे हैं कि मैने अपनी पहली पोस्ट में आखिर ऐसा क्या लिख दिया कि टिप्पणी की बरसात हो गयी वो भी उन दिनों में जब हिन्दी चिट्ठा जगत में टिप्पणी का सूखा सभी तरफ व्याप्त था तो आप भी एक नजर मार लीजिये। ये हमारी बदकिस्मती है कि हम उन अनमोल पहले पहले प्यार सी टिप्पणियों को सहेज के रख नही पाये और ये टिप्पणियां बिल्कुल उसी तरह धुल गयी जैसे कपडे धोने में कभी जेबों के अन्दर छुट गये कागज या नोटों का हाल होता है। यानि कि एक दिन टैम्पलेट बदलने की गुस्ताखी की और सारी टिप्पणियां गायब (नो थैंक्स टू ब्लोगर) तब माइक्रोसोफ्ट की बढी याद आयी थी जो इस तरह की गुस्ताखी करने में अक्सर पूछता है, “आरॅ यू श्योर यू वॉट टू डू दिस”।

फिलहाल उस पहली पोस्ट के बाद तो टिप्पणियों का वो ही हाल था जैसे कि रेगिस्तान में बारिश। अब नये सभी चिट्ठाकार टिप्पणियों के मामले में बडे ही दरियादिल हैं उनकी देखा देखी पुराने चिट्ठाकार भी टिप्पणियाने लगे हैं :) (यहाँ पर स्माईली लगा देता हूँ)। हम शुरू शुरू में तब हिन्दी में यदा कदा ही लिखते थे क्योंकि अंग्रेजी चिट्ठों में मिलने वाली टिप्पणियों का मोह नही छोड पाते थे लेकिन फिर धीरे धीरे टिप्पणियों से मोह उसी तरह खत्म होने लगा जैसे किसी व्यक्ति का अपने झडते बालों के प्रति मोह खत्म होने लगता है (समीर जी का चिट्ठाः बाल महिमा)। सावन के अंधे को जिस तरह हर तरफ हरा ही हरा दिखायी देता है ठीक उसी तरह आज जिस हिन्दी चिट्ठे में नजर फिराओ टिप्पणियां दिखायी देती है। खैर हम अपना टिप्पणी पुराण यहीं पे छोड आगे बडते हैं।

अभी कुछ समय पहले तक हिन्दी में महिला चिट्ठाकारों की संख्या गिनती भर की थी यानि कि कुल जमा तीन (हमें तो यही पता था, चौथी पदमजा हमारे बैटिंग शुरू करने से पहले ही शायद पवेलियन लौट चुकी थी क्योंकि जहाँ तक हमें याद पडता है हमने उन्हें तब रन बनाते नही देखा था)। उनमें से दो मानोशी और प्रत्यक्षा अभी भी डटी हैं मैदान में यदा कदा चौके छक्के भी लगा देती हैं, तीसरी थीं सारिका जो कि चिट्ठे के साथ साथ शब्दांजलि नाम की पत्रिका भी निकालती थीं। आजकल उनका कुछ पता नही है और शब्दांजलि भी काफी समय से बंद पडी है, आशा है कि वो जहाँ भी होंगी सुख शांति के साथ खुशहाल होंगी।

अब आते हैं निठल्ला चिंतन पढने वालों की तरफ, तो मैं उन सभी लोगों का तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ जो अपनी व्यस्त जिंदगी में से कुछ लम्हे निकाल के यहाँ निठल्ला चिंतन पढने आते हैं। उन सभी का डबल शुक्रिया जो चि्टठे पढने के साथ साथ एक अदद टिप्पणी भी छोड देते हैं, डबल इसलिये क्योंकि एक पढने के लिये दूसरा टिप्पणियाने के लिये, विशेष रूप से अमित, समीरजी, संजय और श्रीश का जो निठल्ला चिंतन के साइडबार में टॉप ५ टिप्पणीकार के रूप में विराजमान हैं। उन सभी आदि चिट्ठाकारों का भी शुक्रिया जिन्होंने समय समय में हौसला अफजाई ही नही की बल्कि हर संभव मदद करने के लिये हर वक्त खडे थे। साथ ही साथ आप लोगों से ये भी कहूँगा कि भूल चूक लेनी देनी यानि कि कुछ कभी कहा सुना हो जो आप लोगों को पसन्द नही आया तो छोटा समझ माफ कर दीजियेगा।

इस साल निठल्ला चिंतन का हमें वो ही भविष्य दिखायी दे रहा है जो कि अभी तक वीरेन्द्र सहेवाग के बल्ले का हो रहा है। आशा है आगे भी आप लोगों का यूँ ही प्यार बना रहेगा। अगर आप में से कोई निठल्ला चिंतन की उत्पति की बात जानना चाहता है तो यहाँ नजर मार सकता है।

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