फिल्म समीक्षाः एकलव्य और दो बोनस

फिल्म की लम्बाई की तरह ही छोटी समीक्षा की जायेगी, लेकिन जितनी बढिया फिल्म है शायद उतनी बढिया समीक्षा ना हो पाये। विदु विनोद चोपडा की अभी तक मैने सारी फिल्म देखीं हैं और आज ही एकलव्य भी देख कर आये। उन्होने इस फिल्म के साथ भी अपना ट्रैक रिकार्ड बरकरार रखा है जिसका मतलब है कि उनकी आने वाली अगली दो फिल्में भी थियेटर में देखी जायेंगी। लगभग दो घंटे की इस फिल्म में एक छोटा और प्यारा सा लोरी नुमा गीत है और शायद गीत नही होने की वजह से ही इसकी अवधि भी दो घंटे के आसपास रही।

फिल्म की शुरूआत होती है अमिताभ की जादुई आवाज के साथ जो हमें महाभारत के एकलव्य के बारे में बताती है और अगर कोई थोडा सा दिमाग लगाये तो थोडा बहुत फिल्म के अंत का अनुमान भी लगा सकता है। मैं फिल्म की कहानी बताने वाला नही हूँ लेकिन इतना जरूर है कि अलग सी कहानी है, जब मैने इस फिल्म का ट्रैलर देखा था तो लगा था खूब मारधाड वाली फिल्म होगी लेकिन ऐसा कुछ हुआ नही। फिल्म में दो - तीन ही ऐक्शन या मारामारी या मारधाड वाले सीन हैं और दोनों ही उच्च कोटि के हैं, बस एक बात जो हमें थोडा कन्फयूज्या गयी कि गोलियां कार की साईड से चल रही थीं लेकिन बंदा सामने की तरफ खडा सा लग रहा था, यही नही एकलव्य भी पलट वार सामने की तरफ कर रहा था। खैर मुझे नही लगता किसी ने इतना ध्यान भी दिया होगा और या मैने कुछ ज्यादा ही दिमाग दौडा दिया ;)।

अब आप सोच रहे होंगे कि अगर मारधाड नही है तो किस तरह की फिल्म है, आप लव स्टोरी भी कह सकते हैं और आपसी रिश्तों में बनी फिल्म भी और या राजगद्दी के लिये रंजिस की भी कुल मिलाकर इंटरेस्टिंग फिल्म थी। ऐसा लगता है अभिजात जोशी और विदु विनोद चोपडा की जोडी दिमाग लगा के स्टोरी लिखती है ना कि इधर उधर से प्लाटॅ चुरा के। कुछ लोगों को फिल्म की गति थोडा धीमी लग सकती है क्योंकि अगर नाच गाने वाली फिल्मो से तुलना करें तो ऐसा ही लगेगा।

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी कमाल की है, खासकर सूर्यास्त का वो ऐक्शन सीन, अभिनय के हिसाब से सबने जबरदस्त काम किया है। अमिताभ तो जैसे जैसे बूढे होते जा रहे हैं कमाल करते जा रहे हैं, फिल्म भी उन्हीं के इर्द गिर्द घूमती है जैसे सिर्फ उन्ही के लिये बनायी हो। शैफ अली खान का अभिनय भी तारीफ के काबिल है, बाकि कलाकारों ने भी सधा हुआ अभिनय किया है। कुल मिलाकर मेरे हिसाब से मस्ट वॉच उन लोगों के लिये जो थोडा अलग सा कुछ देखना चाहते हैं बाकि लोगों को हो सकता है बहुत पसंद आये और या ठीकठाक लगे। करण जौहर और यश चोपडा टाईप फिल्म देखने वालों को तो शायद ही पसंद आये।

और अब बात करते हैं दो बोनस की और वो दो बोनस थे विदु विनोद चोपडा की आने वाली दो फिल्मो के ट्रैलर। पहली फिल्म थी, मुन्ना भाई चले अमेरिका और ट्रैलर देख के ही लगता है कि फिल्म मस्त होगी वैसे धोबीघाट को अंग्रेजी में क्या कहेंगे? (सर्किट ने तो वासिंगटन बताया आपका क्या कहना है)। दूसरा ट्रैलर था, तालिस्मान का जो कि देवकी नंदन खत्री की अमर कृति चंद्रकांता संतति पर बेस्ड है यानि कि ऐय्यारों की कहानी, इसमें भी अमिताभ हैं। मैने चंद्रकांता संतति के सारे भाग पडे हैं (वाकई में बडी रोचक है, मौका मिले तो जरूर पढियेगा), और ट्रैलर देख के लगा कि ये हालीवुड के लार्ड आफॅ द रिंगस का जवाब हो सकती है, और बालीवुड में शायद इसके बाद क्या पता अपने हिन्दी साहित्य को लेकर फिल्म बनने का दौर शुरू हो जाये।

मेरा वोट मेरी राय: ***

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Tarun
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3 Responses to “ फिल्म समीक्षाः एकलव्य और दो बोनस ”

  1. अनजान

    वाह मजा आ गया ! सर जी

    बडी अच्छी फिल्म थी। अमिताभ, सेफ, विध्या, संजु सभी का काम अच्छा लगा । वेसे एकलव्य फिल्म का रिव्यु हमने भी अपने ब्लाग पर लिखा है । कृपया देखें
    http://rajsamanddistrict.com/?p=52

  2. इस फिल्म को बिलकुल नहीं देखते मगर अब पूनर्विचर किया जा रह है. :)

  3. आपकी समीक्षा पढ़कर अब फिल्म जरुर देखी जायेगी. धन्यवाद. :)

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