आजकल व्यावसायिक चिट्ठाकारी पर बहस चालू है, बहुतों ने बहुत कुछ लिखा, विवेचन किया तो मैंने सोचा बजाय हर आलेख पर टिप्पणी करने के क्यों ना उस टिप्पणी को पोस्ट की शक्ल दे दी जाय। व्यावसायिकता की बातें तो बहुतों ने पहले ही कर दी इसलिये मैने सोचा कि क्यों ना चिट्ठाकारों (हिन्दी और अंग्रेजी दोनों) पे भी एक नजर डाली जाय।

मुलतः चिट्ठाकारों को दो ग्रुप में बांट सकते हैं, एक जो पूरे वक्त चिट्ठाकारी करते हैं जिनमें अमित अग्रवाल आते हैं और दूसरे जो पार्ट टाईम करते हैं। व्यावसायिक रूप से चिट्ठाकारी करने वालों में अमित जितना कमाते हैं उतना शायद कोई अन्य नही कमा पाता, ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे हाईस्कूल ड्रापआऊट में इक्के दुक्के ही बिल गेट्स बन सकते हैं बाकियों का हाल तो बुरा ही होता है। व्यावसायिकता में सिर्फ लेखन की समझ से बात नही बनती, आप को पाठकों की नब्ज पढनी भी आनी चाहिये और साथ ही साथ मार्केटिंग और पब्लिक रिलेशन बनाना भी। फिल्म उधोग में देखें तो इसका जीता जागता उदाहरण हैं शाहरूख खान, किंग खान से बेहतर कई कलाकार हैं लेकिन वो बाकि बातों में किंग खान के समकक्ष नही ठहरते। शाहरूख खान जानते हैं किस के साथ किस तरह का रिलेशन बना के रखना चाहिये और इसी बात ने उन्हे शायद बादशाह खान की पदवी में बरकरार रखा है। उन्हें मालूम है दर्शक क्या चाहते हैं और वो अपने साथियों के साथ बार बार वही अलग अलग तरीके से परोसते हैं। यही बात लेखन और ब्लागिंग के लिये भी कही जा सकती है, हैरी पॉटर की सीरिज लेखन में कई समकक्ष और पुराने लेखन के सामने कही नही ठहरती, लेकिन व्यावसायिकता में हैरी पॉटर अव्वल ही आता है जिसके लिये जनता रात से ही लाईन लगा के खडे रह सकती है।

अब आते हैं अव्यावसायिक ब्लोगर यानि की पार्ट टाईम चिट्ठाकारों (ब्लोगर) की तरफ, इनमें भी वास्तव में कई सब-ग्रुप हैं। एक वो जो अभी अविवाहित हैं, नवयुवक हैं और जिनके पास काफी समय रहता है चिट्ठाकारी करने के लिये, लेकिन इन में भी ज्यादातर इसे पर्सनल डायरी की तरह उपयोग में लाते हैं। और इनके पाठक वर्ग में उन्हीं के उम्र के दोस्त और बाकि हमउम्र होते हैं जिनका मकसद टाईम पास और दिल की भडास निकालने का होता है। बाकि लोग थोडा उपयोगी लेखन करते हैं और इनके पास इतना वक्त होता है कि वो आराम से हर दिन कुछ घंटा चिट्ठाकारी को दे सकते हैं अपने पंडित जी इसका उदाहरण कहे जा सकते हैं।

अब आते हैं दूसरे सब-ग्रुप की ओर जिनमें ज्यादातर विवाहित होते हैं और थोडा मैच्योर भी, इनमें से कुछ लोग किसी मकसद से और कुछ लोग अपनी लेखन की ख्वाहिस को यहाँ आके पूरा करते हैं। इस ग्रुप की सबसे बडी प्रोब्लम होती है समय की कमी जिसके चलते इनकी चिट्ठाकारी नियमित नही हो पाती। क्योंकि नौकरी के साथ साथ इनके दूसरे भी कई दायित्व होते हैं जिनके लिये इन्हें समय निकालना पडता हैं और उसके बाद ही चिट्ठाकारी का नंबर आता है। कुछ लोग अगर चिट्ठाकारी को प्रमुखता देते हैं तो उनका अपने परिवार के प्रति दायित्व कम होने लगता है जिसका असर तुरंत तो नही दिखता लेकिन ये स्वाभाविक है कि आगे चल के ये परिवार के सदस्यों के साथ दूरी बना सकता है, और नही भी जो कि इस बात पर निर्भर करता है आप कैसे चिट्ठाकारी और परिवार को वक्त देते हैं। इस ग्रुप के लोगों के लेखन में दम तो होता है लेकिन अनियमितता की वजह से इनका रेगुलर पाठक वर्ग नही बन पाता। व्यावसायिक रूप से सफल होने के लिये ये जरूरी हो जाता है कि आप का एक नियमित पाठक वर्ग हो।

तीसरा ग्रुप है थोडा उम्रदराज लोगों का जो ज्यादातर या तो रिटायर हो गये हैं या इसके करीब हैं और या उस स्थिती में पहुँच गये हैं जहाँ उन्हें अपने परिवार को ज्यादा वक्त देने की जरूरत नही या कम वक्त देने से भी काम चल जाता है। लेकिन इनमें से ज्यादातर लोग इतने मैच्योर हो जाते हैं कि उन्हें व्यावसायिकता की होड में बने रहने का कोई औचित्य नजर नही आता, हो सकता है कि वो ब्लोग को थोडा व्यावसायिक बना लें लेकिन उन्हे शायद ही इस बात से फर्क पडता है कि पैसा कम आ रहा है या ज्यादा (ऐसा सिर्फ मुझे लगता है और ये जरूरी नही कि पूरी तरह सत्य हो)।

निष्कर्ष

तो अगर इन तीनों ग्रुपों में नजर डालें तो व्यावसायिकता की संभावनायें तो सब के लिये हैं लेकिन कौन कितना सफल हो सकता है इसका कोई निश्चित फार्मूला नही है। वैसे भी सफलता के मायने सबके लिये अलग ही होते हैं, साथ ही साथ इस तरह से आने वाली आय एक ऐसा नशा भी होता है जो कई लोगों के सिर पर चढ के बोलने लगता है। ऐसे लोगों के उदाहरण में रीडिफ डॉट कॉम और टाइम्स आफॅ इंडिया का नाम देना काफी होगा, जिन्होंने शुरूआत तो खबरों के बीच में विज्ञापन देने से करी थी लेकिन उन विज्ञापनों से होने वाली आयॅ को देखते हुए अब विज्ञापनों के बीच में खबरें देना शुरू कर दिया है। लेकिन अंत में ये तो एक चिट्ठाकार को खुद ही तय करना पडेगा कि वो चाहता क्या है उसका मकसद क्या है। व्यावसायिकता का भविष्य तलाशने के लिये उसकी ओर कदम तो बढाना ही होगा तभी पता चल सकेगा कि व्यावसायिक चिट्ठाकारी का भविष्य क्या होगा।

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