वाह! इनका क्या कहना
अभी अभी ये खबर पढी, वैसे कठोर सिंह से ज्यादा उम्मीद तो ना कभी थी ना कभी होगी लेकिन गद्दी के लिये कोई यहाँ तक जा सकता है पता ना था। नोएडा विजिट करने वाला कोई भी मुख्यमंत्री दुबारा मुख्यमंत्री नही बना आंकडे यही कहते हैं इसलिये कठोर सिंह ने नोएडा से किनारा करना ही उचित समझा, बावजूद इसके कि १७ मासूमों के नरकंकाल वहीं से बरामद हुए हैं। बगैर एकांउट नंबर लिखे चैक बांटने से अच्छा होता एक बार उन गरीबों के दर्द में शामिल होने के लिये जनाब अपना काफिला उस निठारी गांव में ले जाते। दिल्ली से नोएडा सिर्फ २० किमी ही होगा शायद इससे कम ही होगा। दूसरे मिट्टी के शेर का कठोर सिंह की सफाई में कहना था कि कठोर सिंह के छोटे भाई पी डब्लयू डी वाले मंत्री तो निठारी हो आये हैं और क्या चाहिये। गोया कल मुख्यमंत्री की फोटो भेज देंगे और कहेंगे फोटो ने तो विजिट कर लिया और क्या।
आप लोग सोच रहे होंगे कि कठोर सिंह जी दिल्ली में क्या कर रहे थे? ये जनाब सद्दाम को फांसी दिये जाने के विरोध में होने वाले धरना या रैली में हिस्सा लेने आये थे। सद्दाम को ईराकियों ने फांसी दिलायी और दी, इसमें किसी भी भारतीय या भारत का ना लेना एक ना देना एक। लेकिन दर्द इन कठोर सिंह की पार्टी के लोगों को कैसे हुआ खुदा गवाह, ऊपर के हिस्से से बिल्कुल खाली कुछ लोगों ने तो सद्दाम की फांसी के विरोध में एक टूरिस्ट बस में पथराव कर कई लोगों को घायल भी कर दिया।
अब ये बेचारे क्या करें इन कठोर सिंह का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है, उत्तरांचल के लिये प्रदर्शन कर रहे निरीह निहत्थे पहाडी लोगों पे लाठी चार्ज करवाना तो सिर्फ एक उदाहरण है ऐसे दर्जनों उदाहरण ढूँढने से मिल जायेंगे। दुनिया में कहीं से भी सद्दाम की फांसी के विरोध में किसी राजनीतिक पार्टी का विरोध अभी तक तो मैने नही सुना, यहाँ तक कि पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम राज्य भी इस घटना में इतना नही बोले जितनी हुक इस समाजवादी पार्टी को उठ रही है। क्या ये करने से शियाईयों के वोट इस पार्टी को पक्के मिलेंगे? अब ये तो वक्त बतायेगा लेकिन जैसी राजनीति आजकल निठारी जैसी घटनाओं पे की जाती है उससे इतना तो पक्का है कि उत्तरप्रदेश के उल्टाप्रदेश बनने के कुछ ही दिन बचे हैं।
और अब ये कठोर सिंह के भाई की गल सुनो, इन निठारी के नरकंकाल की घटना पर इन साहेब का कहना है,
ये तो एक छोटी और रोज की घटना है, ऐसी घटना घटती रहती हैं, इस बार तिल का ताड बन गया।
कुछ हटकेः इस पोस्ट को लिखते लिखते न्यूज में देखा कि बिहार के मुख्यमंत्री रात को अनिल कपूर ईस्टायल में (याद है वो मूवी जिसमें अनिल कपूर एक दिन के मुख्यमंत्री बने थे, शायद नायक नाम था मूवी का) इधर उधर का दौरा कर रहे थे, लेकिन समझ नही आया इसका पता पहले से ही मीडिया को कैसे लग गया जो साथ साथ इसकी रिकार्डिंग भी करता जा रहा था। या पब्लिक को बेवकूफ बनाने का एक शगूफा था। खैर जो भी हम कुछ नही बोलेंगे।
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This post has 8 comments
January 4th, 2007
कई बार “हम कुछ नही बोलेंगे। ” मे ही भलाई रहती है. मैने तो यही महसूस किया है.
January 4th, 2007
उत्तर प्रदेश से अब कोई उम्मीद नहीं रह गई है। समाजवादी पार्टी का विनाश काले विपरीत बुद्धि वाला हिसाब है, मगर एक समझदार विकल्प तक नहीं है।
January 4th, 2007
आप इसी प्रकार ‘मत बोलते’ रहा करें.
अच्छा व्यंग्य किया है. गरीबों के मसीहा बने समाजवादीयों को बच्चो की निर्मम हत्या से कोई तकलिफ नहीं पर दुसरे देश ने एक तानाशाह को फाँसी दे दी उसमें इनकी तड़प देखते ही बनती है, इनके छत्रछाया में पलने वाले समर्थको का तो कहना ही क्या, पर्यटको के सर ऐसे फोड़े जैसे इन्होने ही इनके प्रिय को फाँसी दी हो.
January 5th, 2007
सही कह रहे है,उत्तर प्रदेश को उल्टा प्रदेश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है इन नेतायों ने।
January 5th, 2007
अरे भईया ऐसा ही होता है, अपने बच्चों की चिंता नहीं और पड़ोसी के बछड़े के दर्द से तड़प रहे हैं, ई ही मंत्री की पहचान है!!
January 5th, 2007
उत्तर प्रदेश क्या सारे उत्तर भारत के हाल बुरे कर रखें है इन नेताओ ने। मै उत्तर भारत और दक्षीण भारत दोनो जगह रहा हूं।
विकास की बात देखी जाये मूल जरूरते है बिजली , सडक और पानी… सारे उत्तर भारत मे (उ प्र, म प्र, बिहार, राजस्थान) तिनो मे बुरे हाल है, वहीं दक्षिण मे इन तिनो की समस्या इतनी बडी नही है।
ऐसा नही कि दक्षिण मे राजनिती नही होती, यहां तो जयललिता और करुणानिधी स्टाईल की राजनिती हावी है जिसमे एक दूसरे की धोती, साडी तक खिंच दी जाती है लेकिन विकास कार्य भी होते है।
यहां कि जनता ज्यादा जागरूक है किसी को भी कभी भी पटखनी देने मे कोई कसर नही छोडते चाहे करुणानिधी हो, जयललिता हो, चंद्राबाबू हो, एंटनी हो … लोगो को कार्य से मतलब है।
भ्रष्टाचार भी है यहां पर, यदि पुल का निर्माण हो, कमीशन जरूर खाया जायेगा लेकिन पुल कागजो पर नही , वास्त्विक रूप से बनेगा।
लालफिताशाही है लेकिन ज्यादा नही, इसलिये हर उद्योगपति यहां आना चाहता है। चेन्नई आजकल भारत मे कार निर्माताओ के लिये केंद्र बन गया है।
समुचा दक्षिण भारत सुचना प्रोद्योगिकि का केन्द्र बन गया है। बंगलोर, हैद्राबाद , चेन्नई के बाद कोचीन, त्रिवेन्द्रम , कोयंब्टूर जैसे शहरो मे सुचना प्रोद्योगिकि की कंपनीया अपने केन्द्र खोल रही है !
उत्तर भारत मे गुडगांव , नोयडा, मोहाली के अलावा कोई और नाम नही है।
लिखने के लिये बहुत है, कभी अपने चिठ्ठे पर फुरसत से भडास निकालुंगा !
January 5th, 2007
हाँ जी खूब याद है यही कठोर सिंह बाअदब थे जिनके इशारे पर आँदोलनकारी महिलाओं से दुर्व्यवहार हुआ। इन्हीं के इशारे पर यशोधर बेंजवाल, राजेश रावत और एक अन्य युवक को शहीद किया गया। अब इराक में सद्दाम को फांसी दी जाती है तो इन्हें दर्द होता है।
January 5th, 2007
हाँ जी खूब याद है यही कठोर सिंह बाअदब थे जिनके इशारे पर आँदोलनकारी महिलाओं से दुर्व्यवहार हुआ। इन्हीं के इशारे पर यशोधर बेंजवाल, राजेश रावत और एक अन्य युवक को शहीद किया गया। अब इराक में सद्दाम को फांसी दी जा रही है तो इनके पेट में दर्द हो रहा है।
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