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हिन्दी ब्लोगिंग वर्जीनिया रेडियो पर

January 27th, 2007 | 21 Comments | Posted in जरा हट के

सुनिये वर्जीनिया रेडियो पर अनुराग द्वारा आयोजित हिन्दी ब्लोगिंग वार्ता में देबाशीष, ईस्वामी, शुकुल जी और अनुराग के बीच हुई बातचीत। बीच में हम ने भी ट्राई मारा था अपनी टांग अडाने का लेकिन कामयाब नही हो पाये तो जिस दौरान हम स्काईप पर कनेक्टेड थे उतने समय की बातचीत रिकार्ड नही कर पाये, अन्यथा बीच बीच में बजने वाले गानों को छोडकर सभी कुछ रिकार्ड करने की कोशिश की है। तो आपमें से जो नही सुन पाये, यहाँ सुन सकते हैं। (सुनने के लिये प्ले के साईन पर डबल क्लिक कीजिये)

आगाज हुआ इसके साथ  

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फिर बातचीत परवान चढी ऐसे  

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ऐसे  

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और ऐसे  

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अन्त में कुछ यूँ हुआ समापन  

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21 Responses to “हिन्दी ब्लोगिंग वर्जीनिया रेडियो पर”

  1. सृजन शिल्पी Says:

    तकनीकी कारणों से मैं भी इस बातचीत में शामिल नहीं हो पाया और यह कार्यक्रम सुन भी नहीं पाया। हालाँकि अनुराग, अनूप जी और देबाशीष जी के साथ कार्यक्रम के पहले हमारी बातचीत हुई थी। आपने बातचीत को यहाँ प्रस्तुत करके बहुत अच्छा किया। बहुत-बहुत धन्यवाद। पहली बार ई-स्वामी और अनूप भाई की आवाज सुनने को मिली, जिनके मँजे हुए लेखन के हमलोग कायल रहे हैं। यह चर्चा अच्छी रही। आशा है कि अनुराग इस तरह के आयोजन भविष्य में भी करते रहेंगे।

  2. अनूप शुक्ला Says:

    भाई हम भी इनटरनेशनल हो गये! लेकिन अपनी ही मधुर आवाज हम सुन नहीं पा रहे हैं! इसे जरा बातचीत को पोस्ट करो न! ऐतिहासिक वार्ता है यह भाई!

  3. Jitu Says:

    भई, हम भी तकनीकी,पारिवारिक और व्यक्तिगत वजहों से शामिल नही हो सके, इसके लिए इस शो के मेजबान से व्यक्तिगत रुप से क्षमायाचना कर चुके है। प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा।

    अनुराग, इसको आफलाइन रिकार्डिंग करने की कोशिश करेंगे। आप सवाल भेज दीजिए (अगले हफ़्ते के) हम जवाब रिकार्ड करके भेज देंगे।

  4. संजय बेंगाणी Says:

    आपने यहाँ कार्यक्रम को रिकार्ड कर रखने का अच्छा कार्य किया है. मैं किसी भी रूप में इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाया था. यहाँ सुन कर अच्छा लगा. खाश कर ई-स्वामी का ‘अंग्रेजी लहजा’ व फुरसतीयाजी का हिन्दी आग्रह.

  5. सुनील Says:

    अनूप, देवाशीष, ईस्वामी, अनुराग, तुम सब की आवाज़ें सुन कर बहुत अच्छा लगा और इस भेंटवार्ता को सब के लिए प्रस्तुत करने का धन्यवाद.

  6. Jagdish Bhatia Says:

    बहुत ही मजा आया पूरी बातचीत सुन कर।
    सभी भाग लेने वालों को बधाई तथा तरुन जी को धन्यवाद। :)

  7. रवि Says:

    मजेदार बातचीत रही. खासकर (संभवतः) जूनियर देबू की बीच-बीच में आती विस्मय कारी आवाजें…?

    और, बातचीत में खासतौर पर मुझे याद करने के लिए धन्यवाद. चाहता तो मैं भी था इस बातचीत में भाग लूं, परंतु मैं ठहरा ऑफ़लाइन जीवी, तो यह संभव नहीं हो पाया.

    तरुण को धन्यवाद इस बातचीत को रेकॉर्ड कर यहाँ उपलब्ध कराने के लिए.

  8. Divyabh Says:

    अच्छा लगा बातें सुनकर हमतक पहुँचाने का शुक्रिया…।कामना करता हूँ कि हमारी भाषा ऐसे ही लोगों के प्रयास से विश्व खिड़की को खोलती रहे…

  9. समीर लाल Says:

    वाकई बहुत सार्थक कदम है और अनुराग जी को साधुवाद तथा अनूप भाई, देबु दा और ई-स्वामी जी को बहुत बधाई और धन्यवाद.

    आशा है आप इसे एक लेख में परिवर्तित करके भी पेश करेंगे, हालांकि मैं प्रस्तुत रिकार्डिंग को पूर्ण्तः सुन पाया. :)

  10. अनुराग मिश्र Says:

    तरुन जी को रिकार्डिंग पोस्ट करने का शुक्रिया। आप लोगों को कार्यक्रम अच्छा लगा, इसका भी धन्यवाद। कार्यक्रम के अनुभव मैं जल्दी लिखने की कोशिश करूँगा। भविष्य में क्या किया जा सकता है, ये भी विचार कर के जल्दी ही लिखुँगा।

  11. ई-स्वामी Says:

    धन्यवाद!
    बोलने से अधिक ध्यान तो इस बात में रहा की ससुरा स्काईप कनेक्शन ही ना टूट जाए!

  12. rachana Says:

    तरुण जी, धन्यवाद. सबको सुनना अच्छा अनुभव रहा. अनुराग मिश्रा जी,आपको भी बहुत धन्यवाद.

  13. देबाशीष Says:

    रिकॉर्डिंग पोस्ट करने के लिये तरुण तुम्हें और अनुराग को इस आयोजन के लिये शुक्रिया! बड़ा ही रोचक और नया अनुभव रहा यह, हालांकि अनुराग ने मुझे मन भर बोलने नहीं दिया ;)

    ईस्वामी ने सही कहा कि हमें बोलने से ज़्यादा कनेक्शन की चिंता सताती रही, अनूप का संपर्क भी बीच बीच में टपकता रहा।

    रवि भैया, जूनियर देबू तो तब तक सो चुके थे तो वो नन्ही आवाज़ किन की थी :) , तरुण?

  14. Tarun Says:

    आप सभी लोगों का शुक्रिया करने के लिये शुक्रिया :) , और वो आवाज बीच बीच में लिटिल ड्रैगन की ही थी। अपने को पता नही था कि अपना सस्ता सा माइक्रोफोन इतना जबरदस्त है। ;)

  15. nikhil anand Says:
  16. nikhil anand Says:
  17. श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' Says:

    वाह वाह बहुत ही अच्छा रहा यह आयोजन। ईस्वामी, देबु दा और फुरसतिया जी की आवाज को सुनना मजेदार अनुभव रहा। फुरसतिया जी को तरकश पर भी सुन चुके थे लेकिन स्वामीजी और देबुदा को पहली बार सुना। फैंटम की आवाज बड़ी मधुर थी। :)

    बीच बीच में तकनीकी व्यवधान से मजा खराब होता रहा। तरुण भेजी को यह पॉडकास्ट उपलब्ध करवाने के लिए धन्यवाद अन्यथा हम इसे कहाँ से सुन पाते।

  18. हर्षवर्धन Says:

    पूरी वार्ता की पोस्ट लिख डालें तो, बढ़िया होगा।

  19. girish billore mukul Says:

    प्रभाव शाली चर्चा रही
    बधाइयां
    गिरीश बिल्लोरे मुकुल

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