चिट्ठागिरीः एक ओर चर्चा
(अपने चिट्ठाचर्चा के बन्धुओं से क्षमा याचना सहित करते हैं शुरूआत एक नये अध्याय की।)
चिट्ठाचर्चा रूपी सीरियल के ऐपिसोड में अपने पोस्ट रूपी रोल (चरित्र) को अंत में छोटी सी जगह दिये जाने और कभी कभी केंची चलाये जाने से क्षुब्ध हम जा पहुँचे भाई के पास। भाई? हाँ भाई बोले तो, बोले तो ….मुन्ना भाई एम बी बी एस। पहुँचते ही सलाम ठोक किसी विपक्षी पार्टी के उम्मीदवार की तरह सत्ता पक्ष को कोसने लगे। मुन्ना भाई बोले ठीक है बाप, अपने रेडियो को स्टॉप लगा यहाँ कोई फायदा नही हमने टपकाने का काम छोड दिया। हम तुरंत बोले, अरे नही मुन्ना भाई वो सब अपने ही भाई बन्धु हैं, टपकाने का नही सिर्फ दुबई से फोनुवा करके धमकाने का है। बीच में ही सर्किट बोला, लेकिन भाई आपने तो ये भी छोड दिया। ये यहाँ से खाली हाथ जायेगा सारी रामकथा बाहर जाकर पब्लिक को सुनायेगा, आपकी तो बाट लग गई।
अबे चुप, रूक जा अपने बापू के पास इसका भी ईलाज होगा। बापू बताओ इसका क्या करूँ? बापू बोले, मुन्ना इसको कहो कि ये भी पार्टी बदल ले और सत्तापक्ष में शामिल हो कर खुद अपने चिट्ठों की चर्चा करनी शुरू कर दे, बीच बीच में कभी दूसरों का चिट्ठा भी बांच दिया करें नही तो वो लोग इसे तुरंत बाहर कर देंगे। मुन्ना भाई ने हमें ये बताया, हमारे तो होश फाख्ता हो गये। मुन्ना भाई हम से ये सब नही होने का, बडी मेहनत का काम है इतनी मेहनत करने की आदत होती तो रोज एक-एक पोस्ट नही लिखते। अब आप ही देखो अपनी तरकश पार्टी वाले संजय ने जब मध्यानचर्चा के लिये सत्तापक्ष को ज्वाइन किया तो साथ में धृत्तराष्टृ को भी साथ में लाये अपनी मदद के वास्ते फिर भी बीच बीच में किसी दिन गुलाटी मार जाते है। (अपने मन में ही हम बोले, एक शुकुल ही हैं जो अकेले ही धडाधडा लिखे जाते हैं लम्बा लम्बा, जरूर रावण की तरह ऊपर वाले ने इन्हें दस दस हाथ दिये होंगे। आफिस जाने से पहले छोड जाते होंगे एक आध जोडा हाथ घर पर टाईप करने के लिये)। अपने से नही होने का ये।
सर्किट ने तुरन्त सुझाया, भाई इसको बोलो चिट्ठाचर्चा ना करके चिट्ठागिरी शुरू कर दे। चिट्ठागिरी वो क्या बला है? हमने पूछा। जैसे दादागिरी, भाईगिरी, गांधीगिरी वैसे ही चिट्ठगिरी। अब चिट्ठागिरी करोगे तो रोज रोज मगज मारी करने का नही, जिस दिन मूड किया उस दिन बस कर डालने का ज्यादती सोचने का नही। अब जैसे अपने भाई लोग कभी कभी दुबई से फोन करके अपने हीरो हिरोईन लोगों को घमकाते हैं बिल्कुल वैसेईच करने का कभी कभी। क्यों भाई है ना आइडिया झक्कास। हमें अब तक इतना पता चल चुका था कि भाई ने टपकाना, धमकाना छोड दिया है तो अपनी हिम्मत थोडी बड चुकी थी सो हम भी बोल दिये, भाई ये सही है हम चिट्ठागिरी शुरू कर देते हैं, लेकिन साथ में आप लोगों को भी आना होगा। वैसे ही जैसे हफ्ता वसूली के लिये और दादागिरी के लिये भाई लोग जाते हैं झुंड में वैसी ही ईस्टाईल में थोडा ना नुकुर करके मुन्ना भाई तैयार हो गये।
हमने भी थोडा मक्खन लगाया, मुन्ना भाई घबराने का नही आप बस साथ में रहना, सारा काम अपुन संभाल लेगा। बस कभी जरूरत पडी तो एक आध डायलॉग मार देने का। तभी सर्किट बोला, भाई अपुन भी चलेगा साथ में अगर तुमको हैल्प का जरूरत पडा तो। मुन्ना भाई बोले ठीक है लेकिन अपना ये बापू भी साथ में चलेगा। अब जो हो ही नही उसके हमारे साथ चलने में हमको कोई फर्क नही पडने वाला था, हमने आराम से हामी भर दी।
फिर हमने कहा ठीक है आज से ही चिट्ठागिरी का शुभ आरम्भ कर देते हैं। इतना सुनते ही सर्किट ने बडा सा पत्थर उठाया वहीं खडी एक कार के शीशे मे घुमा मारा, ‘चटाक’ की आवाज गूँज गयी। भाई ने कहा अबे, सर्किट ये क्या किया? हमने क्या किया भाई ये बोला कि शुभ आरंभ करने का तो अब अपने पास ना नारियल ना ही पास में कोई मंदिर। हमको ये ही तरीका लगा और कर दिया। हमको लग गया कि ऐसे ही अगर चिट्ठागिरी करेंगे तो सत्तापक्ष के लोग हमें ज्यादा दिन अपनी पार्टी में रहने नही देंगे। इसीलिये कुछ गडबड होने से पहले ही थोडा सत्तापक्ष का सुख भोग लें।
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This post has 3 comments
December 21st, 2006
हे हे ! एकदम सही फरमाया जी।
December 21st, 2006
अरे, शुकुल जी का क्या है, दो घर पर, दो साईबर कैफ़ै में और दो मित्र के क्म्प्यूटर पर. लो दनादन पोस्ट पर पोस्ट.
December 22nd, 2006
सही नारियल फोड़ दिया है सर्किट ने . शुभास्ते पंथानम संतु . चिट्ठा-यात्रा शुभ हो!
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