तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा कि ही तर्ज पे थोडा घुमा के कांग्रेस पार्टी ने बोल ही दिया, “तुम हमें वोट दो हम तुम्हें देश के संसाधनों के उपयोग का पहला हक देंगे”। गोया भारत के संसाधन कांग्रेस पार्टी की जागीर हों। माना कि राजप्रथा की तरह इस पार्टी में भी वंशज परम्परा चलती हो लेकिन इसका ये मतलब तो नही कि कुछ भी किसी को भी दे देंगे। देश के संसाधनों में सबका बराबर हक है क्या मुसलमान क्या हिन्दू क्या सिख क्या पारसी या कोई ओर। कई बार मुझे लगता है कि देश के बंटवारे के समय ये भी कह देना चाहिये था कि सारे मुसलमान पाकिस्तान और सारे हिन्दू हिन्दुस्तान चले जायें कम से कम धर्म निरपेक्षता के नाम पर नेताओं को अपनी रोटी सेकने का मौका तो नही मिलता। कांग्रेस पार्टी को शायद ये लगता है कि कभी इनके पीछे रहने वाली ‘म’ से मुस्लिम जनता आज क्यों ‘म’ से मुलायम के पीछे हो ली। शायद उन्हें लगता हो कि कहीं ये ‘म’ का चक्कर तो नही इसलिये ‘म’ से मनमोहन से ये सब कहलवा रही हो।
मुसलमानों को शायद पता हो या शायद नही कि ये युधिष्टर वाली चाल चली गयी है, जैसे युधिष्टर ने कहा था, “अश्वत्थामा मारा गया” और फिर हल्के से जोडा लेकिन हाथी। वैसे ही कहा गया, “देश के संसाधनों मे पहला हक अल्पमत के लोगों खासकर मुसलमानों का है” फिर हल्के से, लेकिन नेताओं के बाद। नेतागिरी एक ऐसी सेंटर आफॅ ग्रेविटी है जो देश के सारे संसाधनों को अपनी ओर खिंचती है और फिर किसी जोंक की तरह चुसती जाती है। अगर ऐसा नही होता तो कैसे किसी बाहुबलि नेता के भाई भतीजे सरेआम कैमरे के सामने पुलिस की मौजुदगी में किसी पत्रकार को थप्पड मार देते। इन नेताओं को कुछ दिनों जेल में भी डाला जाय तो उन्हे वो सब सुविधा तैयार मिलती है जो इन्हे घर पर उप्लब्ध होती है। ज्यादातर गैस स्टेशन इनके या इनके रिस्तेदारों के नाम हो जाते हैं, इन सब की लिस्ट काफी लम्बी है।
धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करके इनका कितना फायदा होगा ये तो पता नही लेकिन अलग अलग धर्म और जाति के लोगों के बीच की खाई दिन-ब-दिन चौडी होती जायेगी। अगर ये धर्म की राजनीति नही होती तो कैसे कोई देश की संसद पे हमला करने वाली की सजा की माफी की गुहार लगाते हुए दिखते। कानून सबके लिये एक होना चाहिये और देश पर सबका बराबर हक होना चाहिये ये बात सभी नेतागण जितनी जल्दी समझ लें देश के लिये उतना ही अच्छा।
5 Responses
समीर लाल
December 13th, 2006 at 4:10 pm
1नेतागिरी एक ऐसी सेंटर आफॅ ग्रेविटी है जो देश के सारे संसाधनों को अपनी ओर खिंचती है और फिर किसी जोंक की तरह चुसती जाती है।
–बहुत सही. आपके लेख से पूर्णतः सहमत हैं.
Nitin Vyas
December 13th, 2006 at 7:05 pm
2बहुत बढिया!!
संजय बेंगाणी
December 13th, 2006 at 10:53 pm
3यही बात अगर हिन्दूओं के लिए कही जाती तो बवाल खड़ा हो जाता. हम किस ओर जा रहें है? आज जरूरत है हर क्षेत्र को धर्म से मुक्त करवाने की और हम इसी पर राजनीति कर रहें हैं.
Pankaj बेंगाणी
December 14th, 2006 at 1:29 am
4आप पाप कर रहे हैं। देश को बाँटने का काम कर रहे हैं। यह ठीक नही है।
ऐसी बाते करना अपराध है। अभी भी वक्त है… झोला लटकाकर झंडे उठाकर हाय हाय करने चले चलो। देश को बाँट लो… और बहुसंख्यकों की ऐसी तैसी कर दो।
Pratik Pandey
December 14th, 2006 at 10:45 am
5वाक़ई यह बहुत दु:खद है कि मज़हब के नाम पर राजनेता अपनी रोटियाँ सेंकते हैं। आज के राजनेता भी अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो, राज़ करो’ की नीति पर चल रहे हैं और यह विभाजनकारी नीति निश्चय ही घातक है। हिन्दू-मुसलमान में फूट डाली जा रही है, सवर्ण-दलित में फूट डाली जा रही है, क्षेत्रवाद के नाम पर उत्तर-दक्षिण में फूट डाली जा रही है। इन राजनेताओं ने भारत की आत्मा को खण्डित करने का कोई भी मौक़ा नहीं छोड़ा है। इस विषय पर आपका लिखना इस बात को इंगित करता है कि राष्ट्र अब जागृत हो रहा है और शीघ्र ही इन विभेदकारी नीतियों और इनके नियन्ताओं के ख़ात्मे के लिए सन्नद्ध हो चुका है। और यह जितना जल्दी हो सके, उतना ही राष्ट्र के हित में है।
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