चलो कुछ जलाया जाय
अगर आप ये सोच रहे हैं कि हम बिजली वगैरह जलाने की बात कर रहे हैं तो गलत सोच रहे हैं क्योंकि जलाया तो उसे ही जाता है जो होता है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कुछ बात नही होती फिर भी लोग आ जाते हैं कुछ ना कुछ जलाने। अब देखिये ना इस बात पर हमेशा छाती ठोकते हैं कि गांधी (जी) ने बगैर बंदूक तलवार के अहिंसात्मक तरीके से आजादी दिलायी लेकिन कोई अगर ये बोल दे कि आजादी दिलाने में शहीदों का, क्रांतिकारियों का भी योगदान रहा सिर्फ अहिंसा से कुछ नही हुआ तो उन्ही गांधीजी के अनुयायी हिंसा पे उतारू हो जाते हैं। अब भैया समझाओ ना उन्हें कि ये विरोध भी थोडा अहिंसात्मक तरीके से करें। लेकिन अगर ऐसा करेंगे तो खुद ही ना गांधी हो जायेंगे अनुयायी कहां से रहेंगे।
अपनी क्रिकेट टीम दे दनादन हारने पे लगी हुई है जैसे खुद से ही शर्मनाक हार से हारने के मुकाबले पर उतरी हुई हो लेकिन ये बात कुछ दीवानों के गले नही उतर रही सो पहुँच गये सडक पर पुतले और फोटुक ले कर। फिलहाल तो उनके फोटु और पुतले में जुता मारके ही काम चलाया जा रहा है। लेकिन इशारे यही कह रहे हैं कि इन पुतलों को कभी भी चिंगारी दिखायी जा सकती है।
बात अब पुतलों की चली तो कहीं किसी मनचले सिरफिरे ने (या राजनीतिवश कौन जाने) अम्बेडकर साहिब के किसी पुतले (आदमकद मूर्ति) पे कहीं एक-दो हाथ जमा दिये। जाहिर सी बात है मुर्ति को क्षति पहुँची लेकिन उसके बाद जो हुआ उससे नुकसान देश का ही हुआ। दो ट्रेन ऐसे जला दी जैसे कि किसी कागज को आग दिखा रहे हों, छोटी छोटी बात पे कार, बस फूँकना तो जैसे फैशन की बात है अपने देश में। पहले तो सरकार वैसे ही कछुए की चाल से विकास करती है उस पर ये फूँकना फूँकाना, एक तो करेला ऊपर से नीम चढा। अब अपने को लगता तो यही है कि हमारा देश विकसित भले ही हो जाये लेकिन यहाँ के रहने वाले….. तौबा तौबा!
तुम्हें ठंड से बचना था,
तो लकडी जलाना था।
काहे इस घर को जला दिया,
किसी का ये आशियाना था।
ये उपद्रवी लोग हैं, जलाने का शौक है तो अपना सामान लाकर जलाओ. देश की सम्पत्ति जो जनते के कमाए पैसे से खरीदि जाती है, उसे जलाना अपराध है. इन्हे सजा दी जानी चाहिए.
ये उपद्रवी लोग हैं, जलाने का शौक है तो अपना सामान लाकर जलाओ. देश की सम्पत्ति जो जनता के कमाए पैसे से खरीदि जाती है, सबके उपयोग की वस्तुएं हैं उन्हे जलाना अपराध है. ऐसे लोगो को सजा दी जानी चाहिए.
यह पैसा ऐसे उपद्रवों में शामिल राजनीतिक पार्तीयों से भी वसुला जा सकता है.
ये दलित राजनितिक पार्टीयो ने दलीतो का सबसे ज्यादा शोषण किया है। इनहे दलितो की चिता पर अपनी रोटीया सेंकने मे आनंद आता है।
महाराष्ट्र के किसी भी दलित नेता का कोई जनाधार नही है चाहे वो प्रकास आंबेडकर हो या गवई, या आठवले या जोगेद्र कवाडे। ये सिर्फ दलितो को भडकाने का कार्य करते है। पुतले के अपमान के बाद जो कुछ हुआ इसके लिये ये ही लोग जिम्मेदार है। ये दलित नेता कहलाते है तो क्या जनता को शांत करना , उन्हे नियंत्रण मे रखना इनकी जिम्मेदारी नही है ?
खैरलाजी का कुख्यात दलित हत्याकांड किसी भी कोण से दलित हत्याकांड नही था, ना ही वह दलित अत्याचार था। यहां वर्ग संघर्ष या जातिगत , सामाजिक वैमन्स्य नाम की कोई चीज ही नही है।
जो कुछ हुआ एक परिवार और गांव के बिच की लडाई है। एक गांव और एक विशेष जाति के परिवार के बीच की नही !
मै इस क्षेत्र (खैरलांजी - भंडारा जिला) को अच्छे से जानता हूं। यहां जातिगत राजनिती/लढायी कभी नही रही है। इस क्षेत्र ने तो बाबासाहब आंबेडकर को जाति के आधार पर वोट नही दिये थे। भंडारा लोकसभा से बाबासाहब आंबेडकर पहला लोकसभा चुनाव हारे थे।
इन दलित पार्टीयो ने बात का बतंगड बना दिया, एक अपराध को ,एक नृशंष हत्याकांड को सामाजिक संघर्ष मे बदल दिया ! क्या इससे दलितो का भला हुवा ? नही ! इससे इन दलितो को जो समाज मे घुल मिल चुके थे, अब समाज से अलग कर दिया !
बहुत चिंतन का विषय है, सब सियासी चालें हैं और भुगतने को आम जनता-ऐसा ही वर्षों से होता आया है।
जहाँ तक दलितों का सवाल है आप मेरी किताब ”किशोरीलाल की आत्महत्या”
पढे शायद समाधान मिल जाए।मैंने जलन की क्रिया को इस किताब में पाठकों पर छोड
दिया है ।
बहुत सुन्दर भाव है
बहुत बधाइयाँ
–कृष्णशँकर सोनाने