अपनी इज्जत अपने हाथ
आज सुबह संजय की इस पोस्ट को पढ के सोचा था कि रात को आराम से टिप्पणी करेंगे, लेकिन रात जब टीवी पर सारा वाकया आंखों से देखा तो इरादा बदल लिया लिहाजा टिप्पणी ने पोस्ट का रूप ले लिया।
आस्ट्रेलियाई टीम ने जो किया वो बदतमीजी की पराकाष्ठा ही कही जायेगी, जिस तरह से पहले हाथ मार और इशारा कर भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष को कप देने के लिये कहा और फिर कप हाथ में लेते ही धक्का देकर मंच से हठा फोटो खींचवाने को तैयार हो गये वो आस्ट्रेलियाई गोरों का दंभ ही दर्शाता है। ऊपर से जले में नमक का काम किया कमेंट्री देने वालों (दूसरे गोरे) की हंसी ने, क्योंकि वो हंसते हुए भारतीय क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष को हटाने की बात कह रहे थे। इतना होने पर पंवार को फिर भी बत्तीसी दिखाते देख गुस्सा ही आ रहा था, इसीलिये कहते हैं कि अपनी इज्जत अपने हाथ होती है। आखिर पंवार एक नेता ही थे पहले जिनकी रीड की हड्डी का पता नही होता और उन्हें ऐसे अवसरों पर भी खींसे निपोरने की आदत होती है।
ऊपर से तुर्रा ये कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने इस बात पर किसी भी कारवाई करने से मना कर दिया आखिर इतना अपमान चुपचाप सहने की क्या वजह। बगैर कोई कारवाई किये हम उनके दंभ को बढावा ही दे रहे हैं। अगर यही सब उल्टा उनके साथ किया जाता तो वो पूरे आइ सी सी को सर पे उठा लेते। अब क्या हम अपने रणबाँकुरों से इतनी उम्मीद कर सकते हैं कि वो आने वाले वर्डकप में आस्ट्रेलियाई टीम की गत बूरी तरह बिगाड इस अपमान का बदला ले सकें? मैं वर्ड कप में किसी भी ऐसी टीम का सपोर्ट करने को तैयार हूँ जो इस दंभी टीम को धूल चटाये क्योंकि अपनी बी सी सी आइ से इस अपमान का बदला लेने की मुझे कोई उम्मीद नही है।
तरुण जी
आपकी सोच बिल्कुल सही है,
मैं वर्ड कप में किसी भी ऐसी टीम का सपोर्ट करने को तैयार हूँ जो इस दंभी टीम को धूल चटाये क्योंकि अपनी बी सी सी आइ से इस अपमान का बदला लेने की मुझे कोई उम्मीद नही है।
इसके लिये आप अभियान का शंखनाद करें कि कोई भी जीते (हमें खुद पर तो उम्मीद कम ही है :)) मगर आस्ट्रेलिया न जीते, ये दंभी.
बी सी सी आई भी पुंछ हिलाती नजर आ रही है. जब स्वाभिमान मर जाता है तब क्या अपमान क्या सम्मान.
मुझे लगता है आइ.सी.सी. को डालमिया ही उसकी ओकात दिखा सकते थे.
सही कहा, उन्होंने जो किया वह बेशक निंदनीय कृत्य था, लेकिन हम भी तो हैं कि हर जगह ‘प्रेम चोपड़ा’ के हाथ में खुद ही साड़ी का पल्लू थमा कर कहते हैं कि लो भैये लूट लो हमारी इज़्ज़त - जो भी बची खुची है और फिर चिल्लाते हैं, “भगवान के लिये मुझे छोड़ दो, तुम्हारे मां बहन नहीं हैं क्या? बचाओ, बचाओ।”
अब ऐसे में भला कौन बचा सकता है?
मेँ भी आपसे सहमत हूँ कि अगले वर्ल्ड कप मेँ काहे कोई भी टीम जीते पर औस्ट्रेलिया नहीँ
अपने रीढ्हीन बोर्ड अध्यक्ष की तरह खिलाडियोँ से भी उम्मीद करना बेकार है|
दुनिया का दूसरे नम्बर का धनी खेल संघ(पहले नम्बर पर ‘फीफा’ है) यदि इस अपमान को चुपचाप सह ले तो लानत है। भारत की समझोतावादी नीति के कारण ही दुनिया में उसका कोई रोब नहीं, यहाँ तक कि बांग्लादेश सरीखा देश हमारे जवानों की लाशों को अपमानित करके लौटाता है और हम फिर भी कुछ नहीं करते। यह नपुँसकता की पराकाष्ठा है।