मुद्दतों बाद फुरसत मिली तो सोचा क्यों ना अपना ‘होम पेज‘ थोडा चुस्त दुरस्त किया जाय। बहुत दिनों से घिस घिस कर हमको चिट्ठों के दर्शन कराता अपना आइ ब्राउजर भी थका सा दिखने लगा था, फायरफॉक्स को नयी नवेली दुल्हन की तरह सहेज कर रखा है कभी कभी ही काम करवाते हैं जब आइ थक कर टांय बोल जाता है। खैर आइ की दशा का विचार कर सोचा चलो पहले आज इसकी प्लास्टिक सर्जरी करायी जाय, इसके पेंच ठीक किये जायें, एनर्जी ड्रिंक पिलाया जाय और इन सब का एक ही इलाज था आइ ७ की डोज मशीन को दी जाये और फिर से सब कुछ चकाचक।
बडे जतन से आइ ७ की डोज माइक्रोसोफ्ट के याहू वाले क्लिनिक से अपनी मशीन में भरनी शुरू करी, रंग देख कर अपनी तो बांछे खिलने लगी थी, ऐसा कुछ लग रहा था कि ये वाली डोज तो शर्तिया मीठी है। थोडा टाईम लगा सारी डोज अपनी मशीन में आ चुकी थी, अब जैसा कि माइक्रोसोफ्ट हस्पताल के इलाज के बाद का दस्तूर है कि आपको कोई भी डोज लेने के बाद मशीन को एक बार सोने को कह फिर से उठने को कहना होता है हमने भी वही किया आखिर सालों कि परंपरा तोडने का साहस कैसे करते। इलाज का असर देखने को ये जरूरी भी था।
आइ ७ चलाया तो कुछ कुछ जेनेरिक मेडिसन (दवाई) जैसा लग रहा था, सारे लेबल हटा के ग्राफिक्स चिपका दिये थे अब आप समझ लो क्या करना है, खैर इससे अपने को कोई शिकायत नही थी क्योंकि धीरे धीरे सब ठीक हो जाना था, इक्का दुक्का साईट चलायी सब कुछ मस्त था। तो अब हम लौटे अपने असली काम की ओर यानि कि अपने ‘होम पेज‘ का हुलिया बदलने की तरफ लेकिन आयला ये क्या आइ ७ ने अपनी साईट के एडमिन (प्रबंधक) पैनल के अन्दर घुसने से इंनकार कर दिया पुछा तो बोला कि तुम्हारा तो तार ही निकला हुआ है मुख्य सर्वर से कोई कनेक्सन ही नही तो मैं अन्दर कैसे जाऊँ। अब क्या करते फायरफॉक्स को सोते से उठाया और साईट के एडमिन (प्रबंधक) पैनल के अन्दर घुसने को कहा, वो तुरंत ही अन्दर घुस गया। हमको लग गया कि भैय्या दवाई में कहीं ना कहीं कोई कमी जरूर रह गयी है और इस रोग को ठीक करने की दवाई चंद दिनों में ही हस्पतालों और उसके क्लिनिकों में आती होगी लेकिन तब तक क्या।
कुछ काम करके मशीन को थोडी देर सुला दिया, फिर से जब जगाया और आइ ७ को अपनी साईट के एडमिन (प्रबंधक) पैनल के अन्दर घुसने को कहा मुआ इस बार ताड से घुस गया। हम खुश कि हो सकता है दवा थोडा देर से असर करती हो फिर बल्ले बल्ले करते हुए नेट पर थोडा टहलने लगे और फिर यकायक आइ ७ ने किसी और के आंगन में घुसने से इंकार कर दिया, इसकी भी वो ही पहले वाली वजह बतायी। मरते क्या ना करते टर्न ले किसी ओर तरफ रूख किया थोडा चलकर फिर वो ही नाटक।
अब ऐसे तो अपना काम चलने वाला नही था क्योंकि जहाँ भी आइ ७ नही गया फायरफॉक्स वहाँ अपना घर समझ जुप्प से घुस रहा था। फिर क्या वो ही अपने पुराने औजार कि तरफ रूख किया, आइ ७ के हलक में अंगुलियाँ घुसेड उसको पिलायी हुयी दवाई उलटने को कही। हलक में अंगुलियाँ जाते ही सारी दवाई बाहर अब अपने पास फिर से वो ही आइ ६ खडा था मुस्कुराता हुआ जैसे कह रहा हो अभी कुछ दिन और मुझसे और मेरी सौत फायरफॉक्स से काम चलाओ।
फिर इन दोनों की मदद से हमने भी अपना ‘होम पेज‘ दुरूस्त कर ही दिया, आप भी एक नजर डालना ना भूलें।
5 Responses
समीर लाल
October 29th, 2006 at 5:40 pm
1वह भाई, बड़ा टंच हो गया है, होम पेज तो. हम भी चले थे आई ७ की तरफ, मगर अब आपकी कहानी सुन कर लगता है कि अभी इसे स्थगित रखना ही उचित होगा.
संजय बेंगाणी
October 30th, 2006 at 12:08 am
2समस्या बयानी का अच्छा अंदाज हैं.
SHUAIB
October 30th, 2006 at 12:52 am
3आपका होम पेज कहीं से भी घिसा हुआ नही लगता (वैसे आपका अंदाज़े बयां बहुत पसंद आया) लेकिन मैं तो आई ७ का ही इसतेमाल कर रहा हूं, अभी तक कोई समसय नही आई।
SHUAIB
October 30th, 2006 at 12:53 am
4कृपया टिप्पणी का फांट साइज़ एक पोइंट बढादें।
Tarun
October 30th, 2006 at 7:56 pm
5फांट साईज? जो हुकुम मेरे आका
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