लॉस्ट इन ट्रांसलेशन
बहुत दिनों पहले गुगल ग्रुप में पोडकास्ट का हिन्दी शब्द ढूंढने की कवायद चली थी। तब से ही सोच रहा था कि ये अनुवाद होने कैसे चाहिये। क्या हर शब्द का अपनी भाषा में अनुवाद करना जरूरी है। मैं ऐसा नही मानता कि अनुवाद करते समय हर अंग्रेजी के शब्द का हिन्दी में अनुवाद किया जाय। भाषा लोकप्रिय बनाने के लिये उसका सरल होना बहुत आवश्यक है, ऐसे कई अंग्रेजी के शब्द हैं जो हिन्दी के शब्दों से ज्यादा सरल और लोकप्रिय हैं। ऐसे ही कई हिन्दी के शब्द हैं जो ज्यों के त्यों अंग्रेजी में उपयोग में आते हैं मसलन चाय, गुरू, योगा, आयुर्वेद वगैरह वगैरह।
अब जैसे मैने एक अनुवाद देखा था छवि भंडारण अगर उसके साथ उसका अंग्रेजी शब्द ना होता तो शायद मेरे फरिश्ते भी ना जान पाते किसका अनुवाद है। वैसे मुझे ये भी नही पता कि ये सही अनुवाद था या नही, अंग्रेजी शब्द था Poll. खासकर विज्ञान से जुडे लेखों में मुझे लगता है कि कुछ शब्दों का कठिन और अनसुना अनुवाद ढूँढने से बेहतर है उसी को हिन्दी में लिख दिया जाय, जैसे सिगरेट श्वेतदंडिका से ज्यादा सरल है और कंप्यूटर संगणक या परिकलक या कलनित्र से ज्यादा सरल।
दिन प्रतिदिन उपयोग में आने वाले शब्दों को वैसे ही लेना चाहिये ना कि उनका हिन्दी में अनुवाद करना ही है ये मानकर कोई कठिन सा शब्द उपयोग में लाकर। सभी अंग्रेजी के शब्दों का हिन्दीकरण करना कितना उचित होगा ये तो वक्त ही बतायेगा लेकिन मुझे न्यायसंगत नही लगता। वैब और अनुवादों में बोलचाल की भाषा का उपयोग करने से ही हिन्दी ज्यादा लोकप्रिय होगी ना कि अंग्रेजी के शब्दों का कठिन अनुवाद कर।
ये मेरी व्यक्तिगत राय है हो सकता है सबको ये पसंद ना आये लेकिन मेरा मानना है कि कोई भी भाषा बडी या छोटी नही होती। भाषा का मुख्य उद्धेश्य होता है किसी व्यक्ति की भावना या विषय का इस प्रकार से उल्लेख करना कि वो एक साधारण से और कम पढेलिखे की समझ में भी आ जाये।
Aapaki baat main shat pratishat sahamat hoon. Aisa hi kuchh maine paricharcha main bhi likha thaa. Halanki jab main apane blog per likhata hoon to fir hindi ki taraf khisak jaata hoon kyonki shuddh hindi main jo nasha he wahi to mujhe blogging ki taraf laya he in the first place. (Hinglish ke liye maafi)
कुछ वस्तुओं का मूल भारत नहीं हैं ऐसे में जहाँ से वे आयी हैं उसी भाषा के शब्द का प्रयोग होना चाहिए. वरना हिन्दी हास्यास्पद हो जायेगी. यथा पित्ज़ा, सिगरेट, कमप्युटर वगेरे….
अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्दों, व वस्तुओं ( संज्ञा ) आदि के नाम तो अंग्रेजी में ही होने चाहिएँ. व्हाइट हाउस को श्वेत भवन कहने पर कैसा लगेगा?
लिनक्स तंत्र में हमने इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर अनुवाद किए हैं. परंतु कहीं कहीं हिन्दी वादियों का भी खयाल रखना पड़ता है.
गूगल समूह पर यह बात मैंने पूछी थी। सच यह है कि मैं आप की बात से सहमत हूं। इसके पूछने का कुछ कारण यह था कि मैं बकबक नाम से पॉडकास्ट करता हूं उसके बारे में कुछ लिखना था यह भी समझ में नहीं आ रहा था कि उसकी post को क्या लिखूं। ब्लॉग की post को तो चिट्ठी लिख देता हूं। बस इसी लिये पूछा था। अन्त में पॉडकास्ट का ही शब्द प्रयोग करने लगा और post को हिन्दी में पोस्ट लिखना शुरू किया।
अनुवाद का कार्य अन्य बातों के अलावा जनसाधारण को सुविधा प्रदान करने के लिये किया जाता है। इस कार्य में कोई भी चीज जो असुविधा पैदा करे, ठीक नही है।
अनुवाद-कार्य के बहुत सारे पहलू हैं। एक पहलू है कि यह किन लोगों को ध्यान में रखकर बनाया जा रहा है-शब्द ऐसे हों जिन्हे आसानी से बोला, लिखा और याद रखा जा सके।
दूसरा पहलू है ‘समय’ का। जब भी कोई नया शब्द उछाला जाता है, वह कठिन होता है। यह हिन्दी वालों के लिये भी सत्य है और अंगरेजी वालों के लिये भी। आज अगर शेक्सपीयर जिन्दा हो जाय और उससे पूछा जाय कि ‘इन्टरनेट’ का क्या अर्थ है तो तुरन्त प्रतिप्रश्न करेगा- यह किस भाषा का शब्द है? कहने का अर्थ यह है कि बार-बार प्रयोग करने से शब्द ‘आम’ हो जाते हैं। कम्प्यूटर को कम्प्यूटर कहें कि संगणक कहे? मेरे खयाल से आज उसे कम्प्यूटर लिखिये, कल लोगों को कम्प्यूटर और संगणक दोनो बताइये, परसो केवल संगणक बताइये। लोगों को झटका नहीं लगना चाहिये।
और एक अन्तिम बात। भाषा में दूरूहता केवल कठिन या नये शब्दों के कारण नही आती। और भी कारणो से भाषा में दूरूहता आती है। उसमे सबसे बड़ा कारण बड़े और जटिल वाक्यों में अपनी बात कहना है। दूरूहता का दूसरा सबसे बड़ा कारण शैली की गड़बड़ी है। कुछ लोग दूरूह से दूरूह बात को भी कुछ ही वाक्यों में आसानी से कह जाते हैं; कुछ लोग कहते या लिखते चले जाते हैं किन्तु अन्त तक बात समझ में नहीं आती।
अनुवाद में भाव की आत्मा नहीं मरनी चाहिए, हां तकनीकी-शब्दावली कुछ कठिन तो होती ही है।
हर नया शब्द कठिन लगता है जबतक वह अच्छॆ से प्रयोग में ना आ जाए। बार-बार प्रयोग से वह सरल बन जाता है।
अनुनाद से सहमत हूँ. शब्द घिसते घिसते चल निकलते हैं.
मैंने इस विषय पर आज कुछ पोस्ट किया है, देखें:
http://hindi.blogspot.com/2006/08/17-18.html
अनुवाद करने में कोई बुराई नहीं है . सभी गढ़े हुए शब्द या पर्याय चल निकलेंगे ऐसा मुगालता किसी को नहीं पालना चाहिये. जनता की एक ‘सामूहिक स्मृति’ होती है . हर नया शब्द उस स्मृति की कसौटी पर कसा जाता है तब प्रचलन में आता है.किसान भी जब बिजाई करता है तो वह यह जानता है कि सभी बीज नहीं उगेंगे, कुछ नष्ट हो जाएंगे । फिर भी वह बिजाई करता है . यह भाषा के बारे में भी सत्य है . कौन-सा शब्द चलेगा और कौन-सा नहीं यह फैसला जनता की ‘सामूहिक स्मृति’ पर छोड़ दीजिए . बहरहाल हमारा लक्ष्य अपना काम जारी रखना होना चाहिये . बस नए शब्द और प्रयोग औचित्य और समझ-बूझ की सीमा में हों तो बेहतर है .
Hi,
we would like inform you that now Hindi Writer WordPress Plugin is out. Visit http://www.monusoft.com/Products/WordPressPlugin/tabid/187/Default.aspx for downloading it. You can install this plug in and user can direclty input hindi comment/post/page from comment box instead of using Hindi IME and then copy/pasting text in comment/post/page box.
Thank you