जिस रोज मुझे भगवान मिले: अंतिम भाग
थोड़ा साहस दिखा मैं फिर से शुरू हुआ, एक बात बताओ भगवन, मस्जिद में औरतों और आदमियों के लिये अलग-अलग स्थान क्यों, उनके लिये समान नियम क्यों नही। अब ये तो उन्ही से पूछो जिसने मस्जिद बनाई मेरा काम तो सिर्फ आदमी बनाना (जन्म देना) और मिटाना (मारना) है, भगवन बोले। अच्छा ये बताईये कि किसी-किसी मंदिर में रजस्वला स्त्री के प्रवेश में प्रतिबंध क्यों? भगवन बोले एक बार कहा ना ये मस्जिद बनाने वाले जाने, मैंने बीच में टोका भगवन मैं मंदिर की बात कर रहा हूँ, दोनों में फर्क है। क्या फर्क है भगवन बोले, दोनों में तुम मुझे ही पूजते हो बावजूद इसके कि मैं ना किसी मंदिर में रहता हूँ ना किसी मस्जिद में।
भगवन ने उल्टा सवाल दाग दिया, अच्छा ये बताओ कि एक शहर में कुल मिलाकर कितने मंदिर मस्जिद होंगे? मैंने जवाब दिया सारे धार्मिक स्थल मिला कम से कम 30-40 तो होंगे ज्यादा भी हो सकते हैं। ये सुन भगवन मुस्कराने लगे, मैने इसकी वजह पूछी तो जवाब मिला, “अब मैं तुम्हारे 33 करोड़ भगवानों का गणित समझ गया इसलिये”। बात काट हमने कहा फिर काहे मंदिर के अंदर की मूर्त को इतना सजा के क्यों रखा जाता है जब आप वहाँ नही रहते। तुम खुद सोचो कोई किसी पत्थर के अंदर कैसे रह सकता है, भगवन ने पलट वार किया। हर इंसान के अंदर मेरा भी एक अंश रहता है लेकिन उसे कोई नही ढूंढता, तुमने जो राम कृष्ण गिनाये थे वो क्या पत्थर से निकले थे।
मैंने कहा नही, बात में वजन था, सोचने लगा बात तो सही है वो भी हमारी ही तरह इंसान थे और अंत में इंसानों की तरह मृत्यु को प्राप्त हुए अब भला भगवान कैसे मर सकते हैं। कैसे भला एक बहलिया एक तीर से भगवान को मार सकता है, भगवान की संतान भी भगवान होनी चाहिये फिर लव-कुश को काहे लोग नही पूजते। भगवान के माँ-बाप भी भगवान होने चाहिये फिर दशरथ सिर्फ एक राजा बनके क्यों रह गये इतिहास के पन्नों पर। मैं खुद ही अपने सवालों में उलझने लगा था।
सामने रोड दिखायी देने लगी थी यानि कि मैं फिर सही रास्ते पर आने वाला था। रोड पर पहुँच मैं किसी गाड़ी का इंतजार करने लगा। दूर से एक गाड़ी आ रही थी, सोचा जब तक गाड़ी पास आती है क्यों ना एक सवाल और दाग दिया जाय। अच्छा प्रभु ये बताईये कि यहाँ इंसान एक दूसरे के खून के प्यासे क्यों हो रहे हैं, आतंकवाद, धार्मिक उन्माद, भूकंप, बाढ़, प्राकृतिक आपदायें ये सब क्यों? सुख और खुशी के साथ सब मिलकर क्यों नही रहते? भगवन बोले, “बेवकूफ अगर ये सब ठीक कर दिया तो धरती स्वर्ग ना हो जायेगी, जब कोई दुख ही नही रहेगा तो फिर मुझे कौन पूछेगा”।
मुझे अपने को बेवकूफ कहे जाने पर बड़ा गुस्सा आया, जंगल निकल चुका था अब इतना डर भी नही था इसलिये नाराजगी दिखाने के लिये पीछे मुड़ा तो देखा वहाँ कोई नही। जो इतनी देर से अपने को भगवान बता रहा था उसका दूर-दूर तक कोई पता नही। सिर्फ जंगल दिखायी दे रहा था, अपनी तो खोपड़ी ही घूम गई तभी बस वाले ने जोर से होर्न बजाया, मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। घड़ी का अलार्म बज रहा था, 7 बज गये थे यानि कि काम पर जाने का वक्त हो गया था। मैं आंखे मलता बाथरूम की ओर चल दिया। पड़ोस से कहीं गाने की आवाज आ रही थी
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सब को सन्मति दे भगवान।
मांगों का सिंदूर ना छूटे, माँ बहनों की आस ना टूटे,
देह बिना भटके ना प्राण, सबको सन्मति दे भगवान।
ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले,
बलवानों को दे दे ज्ञान, सबको सन्मति दे भगवान।।
मैं तैयार हो आफिस को चल दिया, रास्ते में हर आदमी को गौर से देखता जा रहा था सोच रहा था आज से सबके साथ प्यार से पेश आना है, सबको इज्जत देनी है क्योंकि किसे क्या पता ना जाने किस भेष में नारायण मिल जाय।
[...] क्रमशः (अगली पोस्ट में जारी)……… [...]
भाईः ये तो बहुत मज़ेदार लेख शुरू केए हैं आपने - कहां से आए ऐसे खयाल
bahut hi achcha laga.Kripya aise hi lekh likhte rahe.Baat bhagwaan ne 16 aane sahi kahi hai ki hum to bhawan ke hi ansh hai fir kyo mandir ,masjid me hi use doondte hai,apne ander bhi doodhna chaihie.
“mera koi roop nahi …main Nirakaar hoon” kya baat hai ….like in Ramayana..”bin pug chale sune bin kana(ears), kar bin karam kare vidh nana…”
Imagine I’m here through Anubhuti .com.was busy and cudn’t keep in touch
well done.good job.
Now I’ll catch up what I’d missed out here.
TC
-vandy.
Na Mandir Me Na Masjid Me!
Na Kawa Kailash Me!!
Mujhko Kahan Dhundey Re Vandey !
Main To Tere Paas Re!!
Na Mandir Me Na Masjid Me!
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Mujhko Kahan Dhundey Re Vandey !
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Rajesh Sharma
[...] क्रमशः (अगली पोस्ट में जारी)……… [...]