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लॉस्ट इन ट्रांसलेशन

बहुत दिनों पहले गुगल ग्रुप में पोडकास्ट का हिन्दी शब्द ढूंढने की कवायद चली थी। तब से ही सोच रहा था कि ये अनुवाद होने कैसे चाहिये। क्या हर शब्द का अपनी भाषा में अनुवाद करना जरूरी है। मैं ऐसा नही मानता कि अनुवाद करते समय हर अंग्रेजी के शब्द का हिन्दी में अनुवाद किया [...]

[ More ] August 27th, 2006 | 9 Comments | Posted in बस यूँ ही |

नेताओं को एक सुझाव

अभी अभी देखा कि एक बार फिर संसद में नेताओं के बीच हाथापाई होते होते रही तो सोचा क्यों ना लगे हाथ इन्हें एक सलाह दे डालें। सलाह ये है कि क्यों ना साल के एक दिन संसद को अखाड‌े में तब्दील कर दिया जाय, अन्दर से नही संसद के बाहर। और उस दिन इन [...]

क्रिकेटः पूरब बनाम पश्चिम

एक बार फिर एशियाई देशों के क्रिकेटरों पर उछाला गया है कीचड‌‌, आखिर हर बार एशियाई देशों के क्रिकेटरों के ऊपर इस तरह का इल्जाम लगाया जाता है वो भी पश्चिम के अंपायरों द्धारा। पश्चिम के क्रिकेटर दूध के घुले हैं या एशियाई देशों के क्रिकेटर बेईमान। भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्ला देश को इस [...]

[ More ] August 22nd, 2006 | 8 Comments | Posted in क्रिकेट |

वार्तालाप

चुंबन लो, पैसे दो पढ़ने के बाद हाल की एक घटना याद आ गई। न्यूयार्क पेन स्टेशन के बाहर बाल खिचड़ी, महिनों से बगैर नहाये, बेकार कपड़े पहना एक बेघर व्यक्ति खड़ा था। हम आफिस जाने के लिये ट्रेन स्टेशन से बाहर निकल वहाँ पहुँचे ही थे। तभी देखते हैं, दो पुलिस वाले उस आदमी [...]

[ More ] August 20th, 2006 | 3 Comments | Posted in बस यूँ ही |

भागो भूत आया

भूत है बम विस्फोट और ये कह रही है साउथ अफ्रीका की डरपोक टीम जो बस एक बम के धमाके से ही घबरा के अपने बिल में छुप जाना चाहती है। और कहीं बम के नाम पर हार से मुहँ मोड़ने के लिये उठाया गया कदम तो नही, लेकिन जो भी है साउथ अफ्रीका की [...]

[ More ] August 17th, 2006 | 4 Comments | Posted in क्रिकेट |

जिस रोज मुझे भगवान मिले: अंतिम भाग

अब तक आपने पढ़ाः भाग-१, भाग-२ थोड़ा साहस दिखा मैं फिर से शुरू हुआ, एक बात बताओ भगवन, मस्जिद में औरतों और आदमियों के लिये अलग-अलग स्थान क्यों, उनके लिये समान नियम क्यों नही। अब ये तो उन्ही से पूछो जिसने मस्जिद बनाई मेरा काम तो सिर्फ आदमी बनाना (जन्म देना) और मिटाना (मारना) है, [...]

जिस रोज मुझे भगवान मिले: भाग-२

अब तक आपने पढ़ाः भाग-१ नेताओं की देखा देखी बात बदलने की गरज से हमने दूसरा मुद्दा छेड़ दिया। हमने पूछा, अच्छा ये बतायें कि खुदा से रोज मुलाकात होती रहती है या आप लोगों का भी वही रिश्ता है जो आप लोगों के बंदों का यानि मैं बड़ा, मैं बड़ा। हमारे खुदा का मतलब [...]

जिस रोज मुझे भगवान मिले

‘ना माया से ना शक्ति से भगवन मिलते हैं भक्ति से’, एक खुबसूरत गीत है और इसको सुनने के बाद लगा कि अगर मिलते होते तो भी प्रभु हमको मिलने से रहते। क्योंकि माया हमे वैसे ही नही आती, शक्ति हममें इतनी है नही और भक्ति हम करते नही, तो कुल जमा अपना चांस हुआ [...]

कोरपोरेट और कीटनाशक शीतलता

कल ही मधुर भंडारकर की नई मूवी कोरपोरेट देखी, जो व्यवसायिक रूप से असफल रही। लेकिन मधुर तारीफ के हकदार हैं ऐसी फिल्म बनाने के लिये, जहाँ दूसरे फिल्मकार वही पुरानी शराब बार-बार प्रोसेस कर नई बोतल परोसने में लगे हैं वहीं कुछ ही फिल्मकार हैं जो हर वक्त कुछ अलग परोसने की कोशिश करते [...]

[ More ] August 5th, 2006 | 1 Comment | Posted in फिल्‍म, रिव्‍यू |
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