ऐ मेरे वतन के लोगों

दुनिया में युद्ध का सबसे ऊँचा मैदान, खतरनाक पहाड‌ियाँ, एक मुश्किल सा नजर आने वाला काम। भारतीय फौज के जवानों के हौसले बुलंद थे और इरादे मजबूत उन्होंने आतंकियों और उन के भेष में छुपे पाकिस्तानी सैनिकों को भेड़ बकरियों की तरह देश की सीमा से बाहर खदेड़ दिया। इस बात को अब ७ साल बीत चुके हैं, ७ साल अपने गौरव को वापस मिले हुए। तब से जुलाई की २६ तारीख को कारगिल शहीदों की याद में विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

कारगिल ने देश को बहुत जाबांज सिपाही दिये उनमें से कैप्टन अनुज नैय्यर, कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन मनोज पांडे का नाम तो हर घर में सुनायी देता है। भारतीय सेना के ६०० जवान इस युद्ध में शहीद हुए, ६०० परिवारों को बच्चों, पिता और पति के साये से महरूम होना पड‌़ा लेकिन देश को उसका गौरव उसकी इज्जत वापस मिल गयी।

हे कारगिल के शहीदों! कोई भी डिक्शनरी तुम्हारी शहादत को बयान नही कर सकती, मैं तुम्हे सलाम करता हूँ, ये देश तुम्हें सलाम करता है।

 

ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी।
जो शहीद हुए हैं उनकी, जरा याद करो कुर्बानी।
जय हिन्द! 

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Tarun

3 Responses to “ ऐ मेरे वतन के लोगों ”

  1. मातृभूमी की रक्षा करते हुये शहीद हुये हर वीर को मेरा नमन

    जय हिन्द

  2. भारत कि लिए शहीद हुए महान लोगों को मेरा सलाम

  3. हरी धरती, खुले - नीले गगन को छोड़ आया हूँ
    की कुछ सिक्कों की खातिर मैं वतन को छोड़ आया हूँ
    विदेशी भूमि पर माना लिए फिरता हूँ तन लेकिन
    वतन की सौंधी मिट्टी में मैं मन को छोड़ आया हूँ
    पराये घर में कब मिलता है अपने घर के जैसा सुख
    मगर मैं हूँ की घर के चैन - धन को छोड़ आया हूँ
    नहीं भूलेंगी जीवन भर वो सब अठखेलियाँ अपनी
    जवानी के सुरीले बांकपन को छोड़ आया हूँ
    समाई है मेरे मन में अभी तक खुशबुएँ उसकी
    भले ही फूलों से महके चमन को छोड़ आया हूँ
    कभी गाली कभी टंटा कभी खिलवाड़ यारों से
    बहुत पीछे हँसी के उस चलन को छोड़ आया हूँ
    कोई हमदर्द था अपना कोई था चाहने वाला
    हृदय के पास बसते हमवतन को छोड़ आया हूँ
    कहाँ होती है कोई मीठी बोली अपनी बोली सी
    मगर मैं “प्राण” हिन्दी की फबन को छोड़ आया हूँ

    ab meri kya aukat ki mai un shaheedon ki tareef bhi kar saku jo vatan ki rah me fana ho gaye

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