खालीपीली का चिंतन
सोचा चिंतन का तरीका थोडा बदला जाय, निठल्ला चिंतन करते करते बोर हो गये हैं। इस बार खालीपीली भंकस (बकवास) करने की सोची, बकवास हम किये देते हैं चिंतन आप बैठ कर करते रहो। अब देखो ना अपनी दुनिया गरीब की चादर जैसी हो गई है, एक जगह से सिलो (सिलाई करना) तो दूसरी जगह से फट जाती है, दूसरी जगह पैबंद लगाओ तो तीसरी जगह छेद हो जाता है। आप के चेहरे से लगता है बात के पीछे का अर्थ आप कुछ समझे नही। मैं अभी भी नही समझाने वाला क्योंकि इस बार चिंतन आप को ही करना है लेकिन थोडा मदद के लिये ऐसा करता हूँ कि पिछले कुछ दिनों का, महीनों का घटनाक्रम दोहरा देता हूँ।
हमास को आतंकी संगठन घोषित किया गया, फिलीस्तिन के टंटे को किसी तरह निपटाया, चुनाव कराये तो हमास बहुमत से जीत सरकार बनाने जा पहुँचा। क्या करें गले की हड्डी की तरह ना निगलते बने ना उगलते लेकिन किसी तरह मन को समझाया चलो यहाँ तो पैबन्द लगा।
सांस भी नही ली थी कि हिजबुल्लाह ने दो इजरायली सिपाही दबोचे कुछ को मारा बस इजरायल ने ना आव देखा ना ताव जा पहुँचे चादर के फटे का दूसरा कोना सिलने। कमजोर लेबनान सरकार क्या करे उसके लिये भी ये सब गले की हड्डी की तरह ना निगलते बने ना उगलते। दूसरे देशों को शांति का पाठ पढने को कहने वाले देश भी मुँह भींच बैठे हुए हैं, कहीं गलती से भी कुछ निकल ना जाये। यूनाइटेड नेशन के सुप्रीमों की लडाई बंद करने की आवाज वैसे ही दब रही है जैसे संसद में अध्यक्ष की शांति बनाने की अपील। आज ही खबर थी कि 3-4 यूएन के ओबजर्वर बम बारी में मारे गये।
सीलें या फाडें अभी ये भी कोई तय नही कर पाया था कि पाकिस्तान की खबर आयी, फैक्टरी लग रही है एक साल में करीब 50-60 न्यूकलर बम बनाने की क्षमता की। अब कौन बोले? अपने बेटे की शैतानी भला किस को दिखाई देती है लेकिन ताज्जुब इस बात का है कि मीडिया को भी कुछ मिर्च मसाला ना दिखा इस खबर में। अब डर यही है कि ईरान और नोर्थ कोरिया कहीं फिर से ये ना कह बैठें कि हम भी यही शैतानी करेंगे। हम क्या करें अब देश कोई घर तो नही कि पडोस अच्छा नही मिला तो ये बेचकर दूसरा कहीं दूसरी जगह ले लिया।
ईराक और अफगानिस्तान का फटा है कि सिल के ही नही दे रहा, अब सुना कि कांगो में छोटे बच्चों की फौज (फसल) तैयार हो रही है उनके यहाँ की गृह युद्ध लड़ने के लिये। अब अगर लेबनान का फटा जल्द नही सिला गया तो कही ऐसा ना होवे कि पूरी धोती ही बदलने की नौबत आ जाये। सऊदी के राजकुमार तो इस आशंका को जता ही चुके हैं।
डर का क्या, ये तो सब जगह है कहीं जान जाने का तो कहीं पहचान जाने का (खासकर अमेरिका में)। क्यों ताज्जुब हो रहा है कि भारत की कोई बात नही हुई, भारत को तो पहली बार में ही धोती फाड के दी देने वालों ने ये तो किसी से छुपा ही नही है।
कुछ ज्यादा ही हिंट दे दिया आप को, अब तक तो शुरू में कही बात का अर्थ समझ ही गये होगे। अगर नही समझे तो जाने भी दो यारों खालीपीली का ही तो चिंतन है, हिमेश रेशमिया को सुनो और मस्त रहो।


भईये खालीपीली चिन्तन पर हमरा कापीराईट है,अगर ऐसे ही चलता रहा तो हम भी निठल्ला बैठ कर चिन्तन करुंगा !
आशीष,तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं।
मेरे को भी ये खालीपीली, निठल्ला, चिन्तन, तरुन, आशीष, कुछ समझ नहीं आ रहा।