नीम हकीम खतरा-ए-जान

काफी पुरानी कहावत है, अब सबको इसका मतलब पता है कि नही कह तो नही सकता लेकिन इतना बता सकता हूँ कि भारतीय ब्लोगर (जो भारत से ब्लोग करते हैं) जरूर इसका मतलब अब तक जान गये होंगे। हुआ यों कि भारतीय सरकार ने, जो भी कारण रहा हो उसके चलते कुछ इंटरनेट साईटस (20-22) की एक लिस्ट इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर (ISP) को पकड़ा दी कि इन्हें भारत में नही दिखाना है। लेकिन कहते हैं ना कि नीम हकीम खतरा-ए-जान, तो जनाब उन्होनें गला ही दबा दिया गोया कह रहे हों कि जब आदमी ही नही रहेगा तो बीमारी अपने आप ही ठीक हो गयी। अगर अब भी नही समझे तो उन नासमझों ने व्यक्तिगत ब्लोग ब्लोक करने के बजाय पूरा डोमेन ही ब्लोक कर दिया, ना रहेगा बाँस ना बजेगी बाँसुरी।

जाहिर सी बात है ब्लोगर (ब्लोगस्पॉट), टाईपपेड सबसे पुरानी ब्लोगिंग की सुविधा देने वाली साईट हैं इसलिये असमाजिक तत्वों का इन्हें उपयोग में लाने के ज्यादा चांस थे। लेकिन ये सब बातें छोड़ थोड़ा सरकार की बातें करते हैं। हमारी ऐसे ही नीम हकीमों से बनी सरकार वो लिस्ट ISPs को थमा वैसे ही चिंता मुक्त हो गयी जैसे किसी लड़की के माँ-बाप उसकी विदाई करके हो जाते हैं, भैय्या गई पति के साथ अब वही सारी ऊँच-नीच जाने, हमने तो अपना फर्ज निभा दिया। कम से कम सरकार को वेरिफाई तो करना ही चाहिये था कि वाकई में वही साईटस ब्लोक हुईं हैं या कुछ ओर। ताजुब्ब की बात है कि कोई भी इनका नुमाइंदा समाचार नही पढ़ता या देखता; माफ कीजिये भूल गया था कुछ इनके लोग तो शायद पढ़ना भी नही जानते।

अब क्या करें जहाँ धौंस जमानी चाहिये वहाँ भीगी बिल्ली बने रहते हैं, अब ये दादागिरी कहीं तो निकलेगी तो उसके लिये ये ब्लोगरस हैं ही। इन्होने सोचा होगा कि ये ब्लोगर इस बात को लेकर जूनियर डाक्टरों की तरह हड़ताल तो नही कर सकते सो इन्ही पर धौंस जमायी जाये। एक नेता खुले आम सिमी की तरफदारी करता है, दूसरा मुस्लिम प्रदेश की बात करता है लेकिन इन लोगों का ये सरकार कुछ नही कर सकती वहीं तीसरा (विरोधी दल का) मुम्बई आने की बात करता है तो उसे धमकी देने लगती है। ब्लोगरस सिर्फ कहते हैं जो हो रहा ठीक नही हो रहा तो उनकी आवाज ही बंद कर दी जाती है।

अभी-अभी एक मजेदार फिल्म आयी है, नाम है गोलमाल। इसमें तुषार कपूर गूँगा बनकर अपने दोस्तों के साथ दो अंधे दंपतियों को बेवकूफ बनाने के इरादे से उनका पोता बन पहुँच जाता है और तुषार को आवाज देता है एक दूसरा दोस्त अजय देवगन। बाकी के दो दोस्त दंपतियों को पता भी नही लगने देते कि वो भी इस खेल में शामिल हैं और वहीं उसी घर में मौजूद हैं। अब अगर ध्यान दें तो आपको क्या ये नही लगता कि यह किसी ने हमारी कांग्रेस सरकार की कहानी पर मूवी बना ली है। दो खामोशी से खेल देखते दोस्त हुए सहयोगी दल, अंधे दंपति यानि कि जनता और बाकी के आप खुद अनुमान लगा लीजिये अब सब क्या मैं ही बताऊँगा। अईला, ये क्या कर दिया मैने, कहीं ऐसा नाहो कि कल से गोलमाल दिखाने पर भी प्रतिबंध हो जाय।

अब चलते-चलते

रहिमन ब्लोगरस राखिये, डिब्बे में बंद।
लिस्ट थमायी आपने, उसमें नाम थे चंद।।

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Tarun
निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारों की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की; संक्षेप में कहूँ तो ये है थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन।

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6 Responses to “ नीम हकीम खतरा-ए-जान ”

  1. लेख में बिना उत्तेजक भाषा का प्रयोग किये अपनी बात बहुत अच्छी तरह से रखी हैं. बहुत खुब. वैसे अंतिम दोहा ज्यादा मजेदार हैं.

  2. बहुत बढिया… धांसू शैली में लिखा है, मज़ा आ गया। अब लगता है सरकार और आईएसपी, दोनों की आँखें खुल गई हैं और यह प्रतिबन्ध हटा लिया गया है।

  3. बढिया लिखा

  4. ना रहेगा बाँस ना बजेगी बाँसुरी - वाह जी वाह अब तो भारत सरकार ने भी ये गुन सीख लिए ;) वेसे बहुत ही अच्छे अन्दाज़ मे लेख लिखा है

  5. Awesome ! bahut bhadiya.

  6. भा जी, घैंट है।

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