एक सिक्के के दो पहलू
ये कोई पहेली नही जिसे बूझने का ईनाम हो - सिक्का है आतंकवाद, दो पहलू हैं शांति वार्ता और युद्व। सिक्का उछाला गया अब किस को क्या मिला ये कोई मुकद्दर की बात नही। ईजरायल के दो सिपाहियों को हिजबुल्लाह के लोगों ने बंदी बना लिया, ईजरायल ने किसी को ये कहने का भी मौका नही दिया कि इस समस्या को बातचीत से हल किया जाय। अब कहानी ये है कि ईजरायल-हिजबुल्लाह को नेस्तनाबुद करने के लिये एक तरफ लड़ रहा हैं, अमेरिका, ब्रिटेन-अल कायदा नेटवर्क को तबाह करने के लिये दूसरी तरफ। भारत बीच में शांति बनाये रख के लश्करे-तायबा को मदद ना देने की पाकिस्तान से गुहार लगा रहा है। सबको समझना होगा कि अगर आतंकवाद से बिना शर्त निपटना है तो एक ही जुबान बोलनी होगी।
क्या भारत इस के लिए तैयार हैं?
याद करे परमाणु परिक्षण पर खुश हुए लोग ही प्रतिबन्धो से घबरा कर इसे अनावश्यक करार दे रहे थे. भारती युद्धखोरी के लिए तैयार हैं?
हां, एक ही जुबान बोलनी पड़ेगी। प्रश्न है वह किसकी जुबान होगी?
युद्ध केवल तोपों या बम से ही नहीं लडे जाते: युद्ध हजारों तरह के हो सकते हैं| समस्या यह है कि भारत अपने लिये उपयुक्त युद्ध की पहचान नहीं कर पा रहा है| भारत की वर्तमान सुरक्षा-नीति निहायत ही रक्षात्मक, असफल और आत्मघाती है|
उसका समय आ रहा है।