सीरियाना और बहकता मैं

अभी कुछ दिनों पहले ही ये फिल्म देखी थी, इसके बारे में कुछ लिखने से पहले ही धमाके हो गये। मुम्बई वाले सीना चोड़ा करके फिर से घुमने लगे जैसे कह रहे हों देख लो हम नही डरे अगली बार ज्यादा तैयारी के साथ आना। जब ईराकी हर दिन होने वाले विस्फोटों के बाद भी मजे में घूम सकते है तो हम क्यों नही। यहाँ तो 2-3 साल में एक बार होता है। अब अगर हम ये कहें कि पिछले विस्फोटों के बाद अगर सीना चोड़ा करके नही घूमते तो शायद इस बार की नौबत नही आती तो हमें खूब गालियाँ पड़ने वाली है (हम तो पहले से ही मानके बैठे हैं )। एक पत्थर की मूर्ति पर कीचड़ पड़ने से शिव सेना हंगामे कर सकती है लेकिन जिंदा इंसानों के ऊपर बम पड़ने पर भी इनके कान में जूँ नही रेंगती। एक डाक्टर का तबादल होता है सारे डाक्टर हड़ताल पर चले जाते हैं सरकार के खिलाफ। जीते जागते इंसान का तबादला इस दुनिया से दूसरी दुनिया में हो जाता है किसी को सरकार के खिलाफ कुछ कहने का ख्याल नही आता।

काश्मीर में आंतकी खुलेआम कहते हैं ये करो ये मत करो लेकिन सरकार हाथ पे हाथ धरे तमाशा देखती। आप लोग कहोगे ये कोई वक्त है ये सब कहने का, हाँ यही वो वक्त है। क्योंकि कल से फिर जिंदगी अपनी उसी रफ्तार से चलने लगेगी जिसमें किसी को ये सोचने की भी फुर्सत नही मिलेगी, अगर विश्वास नही तो आप भी यहीं मैं भी यहीं। मुम्बई में विस्फोट हुए न्यूयार्क में पुलिस हाई अलर्ट हो गई, सुबह श्रीनगर में विस्फोट हुए किसी को मुम्बई में अलर्ट करने की जरूरत महसूस नही हुई वो भी इस जानकारी के बाद कि ऐसा कुछ कहीं हो सकता है। और वो जगह मुम्बई दिल्ली के सिवा कहाँ हो सकती है। मुम्बई पुलिस कहती है 150 लोग हिरासत में लिये हैं अरे जो 1993 बम विस्फोट के लिये धरे गये थे उनमें से कितनों को सजा हुई, 13 साल तो ऐसे ही हो गये हैं। लश्करे तैयबा और सिमी कहते हैं हम निर्दोष हैं, उनके लिये तो यही कहा जा सकता है,

“मुकर जाने का कातिल ने निराला ढंग निकाला है,
हर किसी से पूछता है इसको किस ने मार डाला है”।

और चाहे तो कह सकते हो “नौ सौ चुहे खाके बिल्ली हज को चली”।

खैर बात तो मैं फिल्म की कर रहा था लेकिन भावकुता और गुस्से में कुछ और ही कहानी कह गया। तो नीरज की पोस्ट में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा कहे गये बयान “या तो तुम हमारे साथ हो या आतंकचादियों के” का संदर्भ पढ़ कर मुझे फिल्म सीरियाना की याद आ गई।

हाँ तो ये सीरियाना फिल्म तेल की राजनीति के चारों ओर घुमती है साथ में आतंकवाद की भी झलक देती है। अगर मौका मिले तो देखना जरूर।

[विषय मुझे बदलना पड़ा लेख पूरा होने के बाद]

 

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Tarun
निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारों की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की; संक्षेप में कहूँ तो ये है थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन।

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