रक्तबीज और मुम्बई घमाके
एक बार फिर दहली मुम्बई, एक के बाद एक 7 बम घमाके। भारत को झुकाना इन आतंकवादियों के बस की बात नही लेकिन इनकी ये कोशिश जारी है सरकार के कमजोर जवाबी कारवाही के कारण। मृतक के परिवार को 5 लाख रूपये और एक सदस्य को नौकरी की जगह अगर ये घोषणा की जाती कि एक मृतक के बदले दो आतंकी और एक घायल के बदले एक आतंकी तो ज्यादा करारा जवाब होता। अगर इस तरह की घोषणा खुलेआम नही कर सकते कोई नही काम को बगैर कहे भी अंजाम तक पहुँचाया जा सकता है।
इस तरह के कृत्यों से इन्ही की कौम को ज्यादा नुकसान होना है क्योंकि एक-दो बार छोड़ भी देंगे लेकिन बार-बार इस तरह की घटनाओं से एक जाति विशेष को लोग हमेशा संदेह की नजरों से देखेंगे। ऐसा पड़ोसी जो तबाही के सिवा कुछ नही दे सकता उसके साथ बोर्डर ओपन करके कुछ नही हासिल होने वाला।
ये आंतकवाद उस रक्तबीज की तरह है जिसके शरीर की एक बूँद के जमीन पर गिरने से दो राक्षस पैदा होते थे। इस तरह की समस्या से निपटने के लिये जड़ पर चोट करना ज्यादा जरूरी है, टहनिया काटते रहने से कुछ नही हासिल होने वाला। जड़ को खाद और पानी देते रहने और टहनिया काटते रहने से हमारा वक्त और उर्जा दोनों ही बरबाद होंगे। अल-सुबह श्रीनगर में हुए धमाकों की श्रंखला से भी सरकार नही चेती जबकि उन्हे खबर थी कहीं कुछ खिचड़ी पक रही है।
सीएनएन: भारतीय रेल के घमाकों में कम से कम 174 की मौत
इंडियनमुस्लिम: भारतीय रेल के घमाकों में कम से कम 80 मरे
The Advertiser: भारतीय रेल घमाकों में मmरने वालों की संख्या 174 हुई
BBC: Scores dead in Mumbai train bombs
BBC: Mumbai bombs: Reaction in quotes
BBC: Kashmir capital rocked by blasts




ये धमाके उन त्रासदियों से कम नहीं हैं जो शिवसेना ने मात्र एक मूर्ति पर गंदगी पोतने के नाम पर फैलाई थी. वे भी आतंक के दूसरे रूप हैं.
मुम्बई अभिशप्त है ऐसे आतंक को झेलने के लिए. परंतु मुम्बईकर भी हिम्मत रखते हैं - ऐसी त्रासदियों का हिम्मत से जवाब देने के लिए.
और जो भिवंडी में हुआ वो भी.
सौ दो सौ के मरने को बडी त्रासदी मत कहिये| हमें जूते खाते रहने में शर्म नहीं, गर्व होता है| हम भारतीय सेक्युलर लोग हैं| भारत के हित बजाय दूसरों का हित हमे अधिक अच्छा लगता है|