संस्कृतियाँ दो और आदमी एक
संस्कृतियाँ दो और आदमी एक, इसे अगर यहाँ अमेरिका में एक शब्द में या संक्षेप में कहना हो तो कहेंगे ए.बी.सी.डी. यानि की अमेरिकन बोर्न कंफ्यूज्ड देसी। जी हाँ, अपनी जवानी में अमेरिका आये लोगों की संतानें इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है। अब घर में उन्हें माँ बाप भारत की संस्कृति सभ्यता सिखाने में लगे रहते हैं और स्कूल कालेज में बेचारों को दूसरी
सस्कृति और सभ्यता से दो चार होना पड़ता है। अब ऐसे में बेचारी नन्ही सी जान कंफ्यूजाइगी नही तो क्या करेगी।
मेरा मानना है कि संस्कृति और सभ्यता का साथ में होना और आना उतना ही जरूरी है जितना कि आदम का ईव के साथ होना। क्योंकि संस्कृति बगैर सभ्यता के अधूरी और यही सभ्यता के लिये भी कहा जा सकता है। बड़े बुजुर्गों के पैर छुना हमारे यहाँ के संस्कार हैं और ऐसे ही संस्कारों को मिलाकर बनती है सभ्यता और फिर सभ्यताओं की पोथी कहलाती है संस्कृति।
अब जबकि ज्यादातर देशों ने अपने अपने बोर्डर ओपन कर दिये हैं यानि कि ग्लोबलाईजेशन के इस दौर में संभावनायें यही है कि हममें से अधिकांश लोगों को दो या दो से ज्यादा संस्कृतियों से रूबरू होना पड़ सकता है। इसलिये आने वाले समय में होना यही है संस्कृतियाँ दो और आदमी एक।


विचार अच्छे लगे.बधाई.
आपके विचार शायद मेरे विचारों की पुष्टि करते है । पढ़ कर जांचिए ।
http://soniratna.blogspot.com
बहुत अच्छा लगा पढ्के अक्सर ऎसा ही होता है। लेकिन क्या किया जाये ये तो फैशन सा हो गया है।
वैसे विचार अच्छे लगे आप को बहुत बधाई।
तरुण जी,
आपका धन्यवाद कि आपने इस विषय पर अपने विचार व्यक्त किए।
“आने वाले समय में होना यही है संस्कृतियाँ दो और आदमी एक”, या शायद संस्कृतियाँ अनेक और आदमी एक।
@समीर, @रत्ना, @हेमंत और @अभिनव शुक्रिया।
@अभिनव, लेख में संस्कृतियाँ अनेक ही झलकती हैं, अंत में ‘संस्कृतियाँ दो और आदमी एक’ तो शिर्षक के साथ ताल से ताल (तारम्यता) मिलाने के लिये लिखा है.