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यानि योग (योगा) में भी लगने लगा धर्म का पैबंद। योगा एक प्राचीन अनुशासित अभ्‍यास है जिसमें व्‍यक्‍ति अपने दिमाग, शरीर और आत्‍मा का मिलन करने या कराने की कोशिश करता है।

योगा आज से पहले शायद ही किसी भगवान या धर्म से सीधा जुड़ा हो क्‍योंकि ये एक ऐसा अभ्‍यास है जिसमें हमें अपने ही अंदर झांकने की कोशिश करनी होती है। लेकिन शायद ये कुछ लोग समझ नही पाये और लेकर आये - ईसाई योगा। शरीर का मूवमेंट वही, सांस लेने का तरीका वही बस एक जीसस को इसमें जोड़ने की कोशिश की गयी -” इन द नेम आफॅ द फादर, एंड आफॅ द सन्‌…..”

लेकिन लोगों को ये मालूम होना चाहिये ये सब करके योगा एक सामान्‍य सा अभ्‍यास रह जायेगा। जब भी लोगों को भूख लगती है तो दो रास्‍ते होते हैं या तो किसी फास्‍ट फूड कार्नर (जैसे मेक्‌डानोल्‍ड) में जाकर खाया जाये और या फिर किसी वास्तविक (पारमपरिक) भोजनालय में जाकर खाया जाय। दोनों ही जगह जाकर भूख तो मिट जायेगी लेकिन खाये गये खाने का शरीर में असर अलग-अलग होगा।

इन लोगों का कहना है हम सूर्य नमस्‍कार करते तो हैं लेकिन हमारे लिये सन (सूर्य) है सन (बेटा वाला) यानि जीसस क्राइस्‍ट

लेकिन मुझे लगता है ये सूर्य नमस्‍कार करने की असलियत से पूरे ही नावाकिफ हैं नही तो ऐसा नही कहते। योगा में जो सबसे पहले किया जाता है वो है सूर्य नमस्‍कार जो सूर्योदय के समय खुले में किया जाता है, इसको करने का मुख्‍य उद्वेश्‍य होता है सूर्य की किरणों को अपने में आत्‍मसात करना ना कि सूर्य को भगवान मान पूजा करना।

तो भाईयों आप लोगों का क्‍या कहना है? योगा को धर्म से जोड़कर इसके नये नये रूप में लाया जाये - ईसाई योगा, मुस्‍लिम योगा, यहूदी योगा वगैरह वगैरह और या फिर इसके वर्तमान रूप को बगैर छेड़छाढ़ किये उपयोग में लाया जाये।

इस बारे में आप कुछ यहाँ और वहाँ भी पढ़ सकते हैं।

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