धर्म बोले तो…….
इस बार काफी दिनों बाद अनुगूँज का आयोजन किया गया और इसकी गूँज इधर उधर सुनायी भी गई। इस बार का विषय है - मेरे जीवन में धर्म का महत्व। वैसे अगर देखा जाय तो हेमामालिनी जी भी काफी कुछ इसमें लिख सकती हैं लेकिन उनको कहे कौन। उनके धर्म पे ज्यादा जोर ना दे कर हम थोड़ा अपने धर्म की बात कर लेते हैं।
एक पुराना प्रचलित गीत है, ‘ना धर्म बुरा, ना कर्म बुरा, ना गंगा बुरी, ना जल बुरा……’ और अगर देखा जाय तो बात काफी हद तक सही भी है।
किसी भी धर्म को बुरा और भला बनाते हैं उसका पालन करने वाले, कर्म तो कर्म है बुरा हो नही सकता बस बदनीयत उसे बुरा बना देती है, ऐसा ही गंगा और जल के लिये भी कहा जा सकता है ये दोनो भी बुरे कहे जाते हैं प्रदुषित होने के बाद।
धर्म शब्द आया है संस्कृत से और ये किसी एक धर्म विशेष (जैसे हिन्दु, बौद्व आदि) के लिये उपयोग में नही आता है। इसका मतलब है सही विचार और कर्म का ज्ञान (दर्शन शास्त्र) ।
मेरे लिये तो धर्म उसी गंगा के समान है जो अपने उद्गम के स्थान पर तो स्वच्छ और निर्मल है लेकिन जैसे जैसे लोगों, आबादी और शहरों के संपर्क में आती जाती है प्रदुषित और मैली होने लगती है। धर्म की भी यही कहानी है, अब चाहे वो इस्लाम हो, हिन्दु, जैन, ईसाई या फिर यहूदी क्यों ना हो।
हर एक का रोना इक जैसा ही है, विचार तो सभी धर्मों के अच्छे हैं लेकिन उनका पालन करने वालों ने उनका अचार बना डाला है।
मैं तो किसी भी धर्म के बारे में नही जानता लेकिन इतना कह सकता हूँ कि ‘मजहब नही सिखाता आपस में बैर रखना’ और सभी धर्मों के लोग (धर्म नही कहा मैने) शक्ति की बजाय व्यक्ति (मूर्ति पूजक) को जायदा महत्व देते हैं। इंसान के काम के अनुसार ही उसका धर्म निरधारण होना चाहिये, जैसे एक फौजी का धर्म है देश की सीमाओं की रक्षा करना, डाक्टर का धर्म है इंसानी जीवन को बिमारी आदि से बचाना और रक्षा करना और अगर कोई अपना काम पूरी ईमानदारी से करे लेकिन कभी मंदिर ना जाये तो क्या वो अ-धार्मिक हो गया। धर्म को मानने और उसका पांखड करने में अंतर है और आजकल पांखडियों की संख्या बड़ती जा रही है। धर्म का कभी भी किसी भगवान से कोई संबध नही रहा है क्योंकि ये विचारों का समायोजन है लेकिन आजकल धर्म की बात खुदा या भगवान के संदर्भ में ही तय होती है।
पहले भी धर्म से संबंधित लिखा था (तेरा पानी अमृत, मेरा पानी पानी, धर्म और बोलने की आजादी) और पहले ही कभी लिखी ‘सुन मेरे मौला‘ की ये चंद लाईन यहाँ पर सटिक बैठती है इसलिये दोबारा पोस्ट कर रहा हूँ।
मेरे मौला, मेरा रहनुमा बन तू मेरे साथ में चल
अपने कल का भरोसा नही मुझको
कम से कम आज तो तू मेरे साथ में चल।
धर्म के नाम पर आदमी ने दिये तुझको नाम कई
बनाया मंदिर, कहीं मस्जिद और बनाये चर्च कहीं।
तू सिर्फ एक है, इस बात को तो ये लोग भूल गये
इनको ये एहसास दिलाने तू मेरे साथ में चल।
कहीं मस्जिद को तोड़ा, तो कभी मंदिर जलाये
आदमी ने आदमी से ये सभी काम कराये।
अपने कर्मो का इन्हे आज भी नही कोई अफसोस
इनको ये एहसास दिलाने तू मेरे साथ में चल।
पहले दंगे कराये, फिर कई मासूम जलाये
मेरे मौला तूने ये कैसे इन्सान बनाये।
अपने कर्मो से ये कहीं हैवान न बन जायें
इनको इक नयी राह दिखाने तू मेरे साथ में चल।
‘तरूण’ देखा नही जाता, धर्म के नाम पर ये सब
इंसॉ के अदंर का भस्मासूर न जग जाये कहीं अब।
इससे पहले कि ये आये, और मिटाये तूझी को
इनके दिलों से खुद को मिटाने तू मेरे साथ में चल।
ये सब लिखने के बाद मेरे जीवन में धर्म का क्या महत्व है ये तो खुद ही समझ लेने वाली चीज है, आप नही समझे क्या अभी तक। अगर नही समझे तो कोई बात नही क्योंकि समझ समझ के समझ को समझो, समझ समझना भी एक समझ है।
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This post has 9 comments
April 4th, 2006
बहुत अच्छे विचार हैं आपके और लेख भी बहुत अच्छा लिखा है. इकबाल साहब ने बहुत बढिया लिखा था “मजहब नहीं ……. परन्तु वह मजहब ही है जिसने आपस मैं बैर रखना सिखाया, दंगे कराये, इन्सान को इन्सान का दुश्मन बनाया.
April 4th, 2006
अच्छा लिखा हैं आपने, पर ऐसे क्लीन चीट भी मत दिजीये मज़हब को.
कहीं लिखा हैं काफिरों को मारो तो, कोई पुकारता हैं मलैछो का नाश हो. फिर कैसे माने कि मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना.
April 4th, 2006
तरुण भाई, बहुत ही बढिया लेख लिखा है।
लेकिन मैं संजय भाई से यह जानना चाहूँगा कि हिन्दू धर्म की किस पुस्तक में लिखा है - मलेच्छों का नाश हो। हाँलाकि दूसरी बात से मैं अपनी सहमति ज़ाहिर करता हूँ।
April 4th, 2006
@सागर धन्यवाद, लेकिन बैर रखना मजहब ने नही इंसान ने खुद सिखा है तभी हिन्दू हिन्दू से और मुस्लिम मुस्लिम से भी बैर रखता है अगर धर्म ने सिखाया होता तो एक धर्म के लोग आपस में तो प्यार से रहते लेकिन ऐसा है नही। अगर बैर रखना ही है तो पाखंड से बैर रखो।
@संजय भाई, किसी भी धर्म में मारने की बात शायद ही लिखी हो, लेकिन वक्त बीतने के साथ लोगों ने धर्म की परिभाषा और नियम दोनो ही बदल दिये। अगर कुछ ऐसा कहा गया है, (जो मुझे नही लगता) तो किस संदर्भ में कहा गया कोई नही जानता। वैसे ही जैसे आज के संदर्भ में आतंकवाद का नाश करने को कहा जाता है।
@प्रतीक शुक्रिया, मुझे नही लगता कि किसी भी धर्म में ऐसा कुछ लिखा हो। हम में से ज्यादातर सुनी सुनायी और आम जनता के अनुसरण के अनुसार अपनी धारणा बनाते हैं।
April 4th, 2006
धर्म को किस रूप में हम अपनाते हैं यह हमारा काम है। धर्म का निर्माण मुल्यों के निर्माण के लिये हुआ।
April 4th, 2006
वाह वाह, क्या लिखा है तरूण भाई, हर तरह से साफ़ सुथरे निकल गए!!
संजय भाई, जहाँ तक मैं जानता हूँ, कुरान में यह नहीं लिखा कि काफ़िरों को मारो। यह तो मौलवियों आदि द्वारा फ़ैलाई गई बकवास है, ठीक उसी तरह जिस तरह हज़ार-डेढ़ हज़ार वर्ष पूर्व रोम पर पोप का शासन था और वे लोग जो ईसाई धर्म को नहीं अपनाता था उसका नाश कर देते थे।
इसका उत्तर तो मैं दे सकता हूँ पर मैं $%^&*(#, कुछ नहीं कह रहा।
April 4th, 2006
@युगल, कितने लोग वास्तव में मुल्यों के निर्माण के लिये धर्म का उपयोग करते हैं।
@अमित, मेरे लिये मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारा सब एक जैसे हैं जाहिर है एक के लिये कुछ कहूँगा वो दूसरे के लिये भी लागू होगा, कुछ गलत तो नही कहा ना।
April 5th, 2006
भई मैंने कब कहा कि किसी एक के बारे में कुछ कहो? बुराई तो सभी में है, विकृत तो सभी हो गए हैं!!
October 7th, 2006
हिन्दुत्व अथवा हिन्दू धर्म
हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक, एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है।आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं।
अधिक के लिये देखियेः http://vishwahindusamaj.com
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