सssssश चुप!
बोलोगे तो……….ऐसा ही कुछ हुआ मेहर भार्गव के साथ उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में। जब उन्होने अपनी बहु के साथ हो रही छेड़खानी का विरोध किया तो उनमें से ही एक युवक ने उन्हें सरेआम गोली मार दी। एक महीने तक मौत से जुझने के बाद आखिर मेहर ने दम तोड़ दिया। एक महीने तक पुलिस कुछ कर नही पायी, क्योंकि बदमाशों को शरण मिली थी सत्ताधारी पार्टी के ही एक नेता के.डी सिंह से। लेकिन जब विपक्षी पार्टी के नेता शोक प्रकट करने मेहर के निवास स्थान गये (और जाने लगे), तो अचानक किसी चमत्कार की तरह पुलिस हरकत में आयी, के.डी. सिंह को पकड़ लिया गया (इस पोस्ट को लिखने तक उसे जमानत भी मिल गयी शायद आप लोगों के पढ़ने तक बाइज्जत बरी भी हो जाय) और मुख्य अभियुक्त सचिन पहाड़ी जान बचाता फिर रहा है।
साफ है कि पुलिस को हर एक बात की खबर थी, तो फिर चुप काहे बैठी थी जाहिर है नेताओं का दबाव होगा लेकिन जब विपक्षी आने लगे तो सत्तापक्ष को चिंता होने लगी वोट बैंक की और जो कुछ हुआ २४ घंटे में सब के सामने है। पहले जेसिका फिर मेहर यानि इंडिया की पुलिस मदारी के बंदर की तरह है, जब मदारी बोले तभी कुछ करो नही तो सर की जुंए गिनो बैठकर। पुलिस को अगर मजबूत करना है, पब्लिक के दिल में पुलिस के लिये सम्मान पैदा करवाना है तो पुलिस वालों को बदलना होगा। नेता और पैसे वालों की जवाबदेही के बजाय वो अगर जनता का साथ दे तो अच्छा नही तो, जनता के लिये लॉकअप में बंद और उनको पकड़ने वालों मे फर्क करना मुश्किल हो जायेगा।
के.डी. सिंह पुलिस सेः
कल तक तो तुम साथ थे, आज हुई क्या बात।
चार दिन की चांदनी, आगे अंधेरी रात।।
के.डी. सिंह पार्टी सेः
कल तक तो तुम साथ थे, आज हुई क्या बात।
विपक्षियों से डर के, छोड़ दिया मेरा साथ।।
जनता के लियेः
बिन मांगे मौत मिले, मांगे मिले ना भीख।
कब तक मार खायेगा, अब तो मारना सीख।।
भैय्या तेश में ना आओ, गोली मारने को नही कह रहा हूँ, फर्क ही क्या रह जायेगा उनमें हममें। उसकी बाद में देंखेंगे। अभी तो बस लिख के मार, बोल के मार और जब वोट देने का नंबर आये तो फिर वोट से मार।
आपके ये शेर बिल्कुल सही हालात ज़ाहिर कर रहे हैं। अब तो ऐसा लगता है कि पुलिस का काम अपराधियों को पकड़ना नहीं, बल्कि उन्हें संरक्षण देना और साक्ष्य मिटाना है। इसके जेसिका लाल, मेहर भार्गव और मधुमिता शुक्ला हत्याकाण्ड जैसे कई उदाहरण हैं।
शुक्र हैं लोकतंत्र हैं और विपक्ष का दबाव कभी काम कर जाता हैं, वरना क्या होता? मैं तो सोचने से भी डरता हुं.
@प्रतीक, सही कह रहे हो पुलिस के काम के लिये
@संजय, चलो कहीं पर तो विपक्ष काम आ रहा है, चाहे अपना फायदा देख कर ही सही