हर तरफ फैला उजाला, हर कली खिलने लगी।
आई सूरज की किरण, रात घर चलने लगी।।
पंछी जो सब चुप थे अब तक, सहसा चहचहाने लगे।
कहीं शोर बच्चों का है तो, कहीं गीत बजने लगे।।
अब भी कुछ ऐसी जगह हैं, जहाँ रहता हरदम अंधेरा।
गोलियों की शोर के बीच, सिसकियाँ लेता सवेरा।।
पंछी वहाँ मिलते नही हैं, बचपन बच्चों में नहीं है।
खून की नदियां है बहती, लाशों की कुछ गिनती नहीं है।।
आओ दे दें उन्हें भी, अपने हिस्से की एक किरण।
चारों तरफ तब हो उजाला, आये जब अगली किरण।।
शब्दांजलि के अक्टूबर 2005 अंक में पूर्व प्रकाशित।
3 Responses
अनूप शुक्ला
March 6th, 2006 at 8:07 pm
1बड़ी बढ़िया कविता लिखी।वाह।
Tarun
March 12th, 2006 at 8:41 pm
2अनुप जी धन्यवाद
फ़ुरसतिया » आइडिया जीतू का लेख हमारा
March 15th, 2006 at 3:48 pm
3[…] तरुन:- हर तरफ फैला उजाला, हर कली खिलने लगी, इक निठल्ली सी हवा, हर तरफ बहने लगी। […]
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The pursuit of happiness is a most ridiculous phrase; if you pursue happiness you'll never find it. - C. P. SnowCategories
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