जाने भी दो यारों

एक के बाद दूसरा जब विसंगति की बात करने लगा तो हमें लगा क्‍यों ना हम भी अपनी ढपली बजा बहती गंगा में हाथ धों लें। अब सवाल यही था कि नाक को पकड़ा कैसे जाय, पहले ने सीधा पकड़ा सब को दिख गया तो लगे सब गलियाने, दूसरे ने थोड़ा समझदारी दिखायी हाथ पीछे घुमाकर नाक पकड़ी कुछ दिखा कुछ नही, संदेह का लाभ मिला वाही वाही ले गये। दोनों लेख के गर्भ में सार एक ही छुपा था बस अंदाजे बयाँ अलग। उस्‍ताद लोग थे अपनी कहानी आसानी से कह गये, हम से दोनों में ही कमेंट देते ना बना, समझ ना पाये गलियायें या वाही वाही दें। सोचा नाक पकड़ने के इस क्रम को क्‍यों ना आगे बड़ाया जाय। मामला साफ था बात हो रही थी देश की आर्थिक उन्नति और सामाजिक अवनत्ति को लेकर।

साथ में शिकायति पुट भी था हर वक्‍त आलोचना क्‍यों इसलिये सोच लिया चाहे कुछ भी हो जाय इसबार गल्‍ती से भी आलोचना नही करनी है। बात देश की प्रगति से ही करते हैं, अखबारों में पढ़ा है आर्थिक विकास जमकर हो रहा है अब अखबार गलत खबर तो देंगे नही सो मान लिया सच है। विकास दो तरह से होता है क्‍वांटिटी (नंबर) बढ़ाकर या फिर क्‍वालिटी (गुणवता) बढ़ाकर, अब क्‍या हुआ जो हम क्‍वांटिटी (नंबर) बढ़ाकर विकास कर रहे हैं - जनसंख्‍या बढ़ रही है, मोबाइल फोन बढ़ रहे हैं, गाड़ियाँ बढ़ रही हैं, मेक् डोनाल्‍ड पिज़ा हट वगैरह बढ़ रहे हैं, सीनेप्‍लेक्‍स बढ़ रहे हैं, बड़ी बड़ी ईमारतें बढ़ रही हैं, झुग्‍गी झोपड़ियाँ भी बढ़ रही हैं, कॉल सेन्‍टर बढ़ रहे हैं। पहले जहाँ आदमी पैसा जमाकर के फिर खर्च करता था अब पहले खर्च करता है फिर कर चुकाता है, सब की चांदी सब खुश। जो अमीर था और अमीर हो रहा है गरीब और गरीब रहा सवाल मध्‍यम वर्गीयों का तो उनकी मदद करने को प्राइवेट बैंक हैं लोन लो अमीरी का मजा लो उसके बाद अगर समय से नही चुका पाये तो फिर गरीबी का मजा लेना।

पहले शहर के आसपास अगर कुल 10 रोड होती थीं अब 100 हैं क्‍या हुआ जो उसमें गड्ढे हैं किसी ने कहा है क्‍या कि उसमें कार या मोटर साईकिल से चला कीजिये। पैदल चलो, सेहत बनेगी, दूसरे साधन ट्राई करो क्‍या पता कब जरूरत पड़ जाये, पैट्रोल का कोई भरोसा है क्‍या, आज है तो कल नही। अगर पैट्रोल आज खत्‍म तो कल से कौन आगे - हम, गाड़ी नहीं तो बैलगाड़ी देश तो चलता रहेगा ना। ऐसा नही कि चकाचक रोड बना नही सकते, लेकिन एक बार जनता को इसकी आदत लग गयी तो वही हल्‍ला मचायेगी जो बिजली को लेकर मचाती है।

अब बिजली जाती है तो हल्‍ला मचाना शुरू अमेरिका में तो हर वक्‍त रहती है यहाँ क्‍यों नही। ये नही देखते कि चाहे हर वक्‍त रहती है, लेकिन हम उनसे ज्‍यादा आगे हैं, हमारे यहाँ हर घर में एक बिजली का कनेक्‍शन है और एक जनरेटर (या इनवर्टर) का, कुछ वक्‍त सरकारी बिजली का मजा लेते हैं और कुछ वक्‍त जनरेटर की बिजली का। और खुदा ना खास्‍ता अगर दोनों ही टें बोल जायें तो सदाबहार मोमबत्ती और घासलेट की लालटेन तो है ही अपने पास। अब बताओ, आगे कौन - हम, एक समस्‍या 10 इलाज।

क्‍या कहा जनरेटर की आवाज से ध्‍वनि प्रदुषण और धुंए से वायु प्रदुषण होता है, भैय्‍या किस दुनिया में रह रहे हो। मंदिर के घंटे और मस्‍जिद की आवाज का क्‍या, पड़ोसी के घर में शादी या धार्मिक कार्यक्रम के दौरान चलते हुए लाउड स्‍पीकर का क्‍या। अरे यही तो आवाजें हैं जिनसे ये लगता रहता है कि देश सोया नही जाग रहा है और सारे काम धाम जारी हैं। ऊपर वाले ने कान किस लिये दिये हैं सुनने को, कोई आवाज ही नही होगी तो सुनोगे क्‍या खाक। पड़े पड़े कान में जंक लग जायेगा किसी काम के ही नही रहेंगे। वायु प्रदुषण में रहने के एक बार अगर आदी हो गये तो फिर सांस रहने के लिये आक्‍सीजन पर निर्भरता खत्‍म हो जायेगी कार्बन डाई आक्‍साइड भी सांस लेने के काम ला सकेंगे। उस वक्‍त फिर आगे कौन - हम और कौन।

सारी दुनिया में या तो अमीर देश हैं या फिर गरीब लेकिन अपना देश ही एक ऐसा है जहाँ गरीब अभी भी ज्‍यादा हैं लेकिन फिर भी अमीर होता जा रहा है। होगा भी क्‍यों ना आखिर कमल कहाँ खिलता है कीचड़ में, कीचड़ नही तो कमल नही। कीचड़ साफ करने की कोशिश में कहीं कमलों से हाथ ना धोना पड़े इसलिये जैसा चल रहा है चलने दो। भारत विविधता का देश है, हिन्‍दू, मुस्‍लिम सिक्‍ख ईसाई, बौद्व, जैन, पारसी, अमीर, गरीब सभी यहाँ भाई चारे के साथ रहते हैं। हम तो हमेशा से ही मानते आये हैं दाने दाने पे लिखा है खाने वाले का नाम - अब हम क्‍या करें अगर किसी को एक निवाला मुश्‍किल से नसीब हो और दुजा भगवान को छप्‍पन भोग लगाये।

अगर सब कुछ ठीक हो गया तो जीवन में निरसता नही आ जायेगी, दिन और रात होते ही यही समझाने के लिये हैं, दिन ही दिन या रात ही रात होने लगे तो फिर क्‍या मजा। जहाँ पीछे रहना चाहिये वहाँ हम पीछे हैं  दुनिया में हमारे सबसे ज्‍यादा दुश्‍मन नही, शांति और अमन में आगे कौन - हम और कौन। हमारी अदालतें भी यही कहती है कि एक बेगुनाह को बचाने के लिये अगर 10 गुनाहगार भी छोड़ने पड़े तो हम करेंगे। और अगर अदालतें गरीब और असहाय का साथ देती हैं तो अमीर और ताकतवर का साथ देने को अपनी पुलिस है। मुकाबल बराबरी का होना चाहिये किसी को लगना नही चाहिये कि किसी के साथ ज्‍यादती हो रही है।

अब कोई ये शिकायत करे कि हम अपने देश की तुलना क्‍यों करते हैं तो इसमें अपना कोई कसूर नही, जिस देश का बच्‍चा ‘मेरी कमीज उसकी कमीज से सफेद कैसे’ देखते देखते बड़ा होये वो तो तुलना करेगा ही, कमीज में तुलना, पढ़ाई में तुलना। बच्‍चों को छोड़िये, पड़ोसी करे पड़ोसी से तुलना कभी कार में तो कभी बार में। हम जैसे कुछ लोगों ने कुछ समय के लिये ही सही अगर देश छोड़ भी दिया लेकिन तुलना करना नही छोड़ा - इसलिये अब एक देश की दूसरे देश से तुलना करते हैं। अब कोई कुछ भी कहे, हम आगे बड़ें या पीछे ‘विविधता में ऐकता’ हमेशा ही रहेगी।

एक मजदूर यहाँ अगर हड़ताल कर सकता है तो जीवन बचाने वाले डाक्‍टर भी। सरकारी कर्मचारी चाहे काम पर हों या हड़ताल पर देश उसी रफ्‍तार से चलता रहता है - है ना कमाल। देश में चाहे गरीबी हो लेकिन टीवी सीरियल और फिल्‍मों में मजाल है कहीं से ऐसा कुछ दिख जाये। हमें तो ये सब दिखता रहता है जिन्‍हें नही दिखता वो आयें और दिखायें। अब बाहर वालों को ऊँची ईमारतों के बीच में छोटी छोटी झुग्‍गियों में दिलचस्‍पी है तो कोई क्‍या करे। कल अगर ये झुग्‍गियाँ ना रहे तो विदेशी तो आना ही छोड़ देंगे कैमरा लेकर। ये हट गयी तो अपने देश के बारे में विदेशी पत्रकार क्‍या लिखेंगे।

कुछ भी हो अगर घर के बाहर आसपास का स्‍तर गिर रहा है तो घर के अंदर ज्‍यादातर के रहने का स्‍तर तो बढ़ ही रहा है। ऐसे नही तो वैसे प्रगति तो हो ही रही है, हमने तो अपना राग अलाप लिया समझ आया तो ठीक नही तो जाने भी दो यारों।

About the Author

Tarun
निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारों की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की; संक्षेप में कहूँ तो ये है थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन।

[आपकी हर तरह की टिप्पणी का स्वागत है, ये प्रोत्साहन तो देती ही है साथ में ये भी पता चलता है कि आप लोग किस तरह के आलेखों की अपेक्षा करते हैं। और अगर आप चाहें तो निठल्ला चिंतन को सीधे ईमेल के द्वारा सब्सक्राईब कर सकते हैं और या फिर फीड रीडर में सब्सक्राइब करके भी पढ़ सकते हैं]

5 Responses to “ जाने भी दो यारों ”

  1. बहुत ही सटीक कटाक्ष किया है. पूरी तरह से सहमत हूँ. दुर्भाग्यवश हम भारतीय दिमाग से कम दिल से ज्यादा सोचते हैं. कभी समय मिले तो shria hotmail.com पर लिखो.

  2. भाई, अपने घर के कूड़ा करकट को तो देखना ही पड़ेगा तब ना हम उसे साफ सूफ करने के बारे में सोच सकेंगे. अगर कूड़े को नहीं देख ऊपर ऊपर की सुन्दरता ही देखते रहेंगे तो हम भी तो हो जाएँगे धूल धूसरित एक दिन!

    लाली देखन मैं चला…. यह बात तो सदियों पहले कबीर कह गए थे, अब भी लागू है…

    :)

  3. ढपली तो बड़ी बढ़िया बजाई। मजेदार!

  4. घर का कुडा करकट देखना एक बात है और उसे साफ करना एक बात. कुडा करकट का फोटो खिंच कर कर अखबार मे छाप देने से बह साफ नही हो जायेगा. उसे साफ करने किसी को आगे आना होगा. और हम इसी से कतराते हैं.

    आलोचना जरूरी है लेकिन यह निन्दा नही होनी चाहिये.
    अलोचना करे, जरूर करे, लेकिन विसंगती को दूर करने सामने भी आयें अन्यथा आपकी आलोचना का मतलब क्या है ?

    युग निर्माण योजना का नारा है

    हम सुधरेंगे जग सुधरेगा !

  5. @अतुल: सही है बस दोनों का समान संतुलन बना रहे वो ज्‍यादा अच्‍छा है :)

    @रवि जी: समस्‍या यहीं है, अपने घर का कूड़ा साफ करने के चक्‍कर में इंसान बगैर जाने बाहर गंदा कर देता है। सोचता है अपना घर साफ रहना चाहिये, हर कोई कूड़ा जगह पर डाले आधी गंदगी तो ऐसे ही साफ हो जायेगी। :)

    @अनुप जीः आप लोगों की संगति का असर है। :)

    @आशीषः जब कालेज थे तब ये भी किया था यानि सफाई अभियान जहाँ तक सफाई का है वही कहूगा जो ऊपर लिखा है। लेकिन तारीफ, आलोचना और निंदा तीनों जरूरी हैं, बस अब आप को देखना है कहाँ पर क्‍या की जाये। रहा विसंगति सुधारने का तो हर कोई अपने को सुधार ले आधी विसंगति तो ऐसे ही ठीक हो जाये। :)

Leave a Reply

You can use these XHTML tags: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <blockquote cite=""> <code> <em> <strong>