एक लम्‍हा

१-२ महीने पहले ये निठल्‍ला चिन्‍तन किया था एक लम्‍हे के लिये, पढ़ कर मजा लीजिये।

एक लम्‍हा एक दिन ले के आया बाटली,
चलता था लड़खड़ा के, जब से दारू चाट ली।
बाटली को गटक के, वो वहीं बस रूक गया,
आने वाला कल ना आया, आज कुछ थम सा गया।

यम था हैरां परेशाँ, लोग क्‍यों नही मर रहे,
ऐसा क्‍या है हो गया, जो मौत से नही डर रहे।
दौड़ा-दौड़ा खुद गया, देखने को क्‍या हुआ,
दारू की दुकाँ पे देखा, लम्‍हें को बैठा हुआ।

यम को जब देखा लम्‍हें ने, उसकी भृकुटी तन गयी,
यम को भी ये लग गया कि लम्‍हें को दारू चढ़ गयी।
सोचना था यम को जल्‍दी इस समस्‍या का इलाज,
लम्‍हें के चारों तरफ थे, दारू के बिखरे गिलास।

यम ने छीनी इंद्रियाँ, गुस्‍से में तब लम्‍हें की,
होश में आया, नही थी कुछ खबर लम्‍हें को लम्‍हें की।
तब से ही नित नये रूप लेता और भटकता फिर रहा
बार-बार आता और जाता, ये लम्‍हा थमता नही।

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Tarun
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7 Responses to “ एक लम्‍हा ”

  1. वाह वाह ! छा गये गुरू !

    बढिया है.

  2. पढी दास्तां लम्हे की और किया आत्म-विश्लेषण,
    मज़ा तो आया पर हुआ कुछ-कुछ “काम्प्लेक्शन”,
    हम क्यों ना कर पाए कुछ ऐसा “लेखन”,
    जिसे पढ-सुन कर लोग करें “ध्वनि-ए-करतल”,
    उस कविता में तो आ गए लम्हा, बाटली और “यम”,
    हम यहाँ बैठे करते रह गए “कीर्तन”,
    तभी जली बत्ती दिमाग की, हुआ वातावरण कुछ “रौशन”,
    हमें क्या जरुरत है करने की ऐसा “मंथन”,
    अपना तो मुकाबला है जिनसे वो हैं लेनिन, मार्क्स और “लिंकन”,
    ये काम तो है निठल्लों का,
    और उन्ही को हो मुबारक ये “निठल्ला चिंतन”!

  3. थामना हो लम्हे को तो दो धूंट तुमभी मारो,
    ऐसा कहने वाला कह गया हैं.
    फिर ना होश में यम रहे, न हम रहे,
    पकङ लो लम्हा भी ठहर सा गया हैं.

  4. बहुत खूब…सही व्‍यंग कसा है आपने…पढकर आनंद मिला….दाद कबूल करें….
    सेहर

  5. बढ़िया चिंतन है। अइसे ही और चिंतन का इंतजा़र है।

  6. @आशीष, धन्‍यवाद :)

    @विजय, अच्‍छी है तुम्‍हारी कुलबुलाहट, क्‍यों बरखुदार कुछ मन हल्‍का हुआ कि नही :) इतना ही कहूँगा कि सबसे मुकाबला करने की आदतें हों तो अच्‍छा है, क्‍योंकि लेनिन और मार्क्स तो मास्‍को तक सीमित हो कर रह गये, अब रह गये लिंकन अकेले कुलबुलाने को। ;) आज के दौर की निठल्‍ली दुनिया के लिए चिंतन निठल्‍ला हो तो अच्‍छा क्‍योंकि ना उनको समझने में तकलीफ ना हमें कहने में। :)

    @संजय, बात दो घूंट में रूक जाय तो फिर क्‍या बात है, और फिर जिसे अपना ही होश ना रहे उसे तो खुद को थामने के लिये लोग चाहिये क्‍यों क्‍या कहते हो, शराबी का साथ जैसे अंधेरी रात ;)

    @सेहर, आपकी दाद सल आंखों पर, धन्‍यवाद

    @अनूप जी, आपको पसंद आयी और क्‍या चाहिये, धन्‍यवाद आप लोगों की सोहबत का असर है

  7. यम से पूरी पूरी सहानुभूति है ।
    घुघूती बासूती

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