ढोल की पोल

आजकल दिल वालों की दिल्‍ली के दिल और एम. सी. डी. के बीच शायद छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। एम. सी. डी. ताबड़तोड़ अवैध निर्माण तोड़े जा रही है और जिनके टूट रहे हैं वो हल्‍ला बोल किये जा रहे हैं। हम सही हैं दिखाने को इस बार एम. सी. डी. ने आम जनता के अलावा खास जनता को भी निशाना बनाया। बस खास जनता भी हत्‍थे से उखड़ गई, एक फैशन डिजाईनर तो ये फरमा रहे थे कि भैय्‍या उनकी दुकान में क्‍यों बुलडोजर फिरवा दिया, वो तो देश के नूर हैं, देश का नाम रोशन कर रहे हैं वगैरह वगैरह। डेमोक्रेसी है इसका ये मतलब तो नही कि किसी को भी कुछ करने की छुट मिल जाये। बल्‍कि ऐसे देश के नूरों से तो यही उम्‍मीद की जानी चाहिये कि कम से कम वो तो कानून से चलेंगे, अवैध निर्माण कराने से तो अच्‍छा होता नक्‍शा पास करवा लेते।

इस मामले में तो सभी दोषी है क्‍या जनता क्‍या हवलदार। जब ये अवैध निर्माण हो रहे थे तो क्‍या ये एम. सी. डी. वाले सो रहे थे, कोई कोई जनता के पास तो खिला-पिला के पास किये गये पेपर भी थे। अब खाने वालों ने इतनी भी ईमानदारी नही दिखायी कि इनका रिकार्ड भी रख देते। अब कहानी जो भी हो, तिनका तिनका कर आशियाँ बनाने वालों का क्‍या हो। खैर जनाब एम. सी. डी. का ये ढोल जितना भी शोर कर रहा था उसकी पोल खोलने के लिये लोग-बाग (विरोधी गुट के नेता और लोग) कमरकस तैयारी कर रहे हैं। आगे की कहानी ये है कि दिल्‍ली में मुख्‍यमंत्री समेत कई नेता लोग अवैध निर्माण के दायरे में आये हैं (या आ गये हैं) लेकिन उनकी गलियों में बुलडोजर (और उसके मालिकों) की भी हिम्‍मत नही की जा सके। ये इंडिया के कानून में कोई प्रावधान है क्‍या कि जो राजनीति करे, उसे सब माफ। छुट भईये हों या बड़ भईये, अंदर हों या बाहर कुल जमा ऐश ही ऐश।

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Tarun
निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारों की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की; संक्षेप में कहूँ तो ये है थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन।

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