अगर आप सोचते हैं कि रंग दे बसंती एक देश भक्ति की फिल्म है तो आप गलत सोचते हैं, और अगर आप सोचते हैं कि रंग दे बसंती एक देश भक्ति की फिल्म नहीं है तो भी आप गलत सोचते हैं। क्यों खा गये ना गच्चा, यही इस फिल्म की तारीफ है कि फिल्म खत्म हो जाती है और आप यह निर्णय नही ले पाते।
पूरी फिल्म की कहानी तो मैं बताऊंगा नहीं लेकिन कोशिश करता हूँ कि इस पोस्ट के अंत तक इतना जरूर लिख दूँ कि आप थियेटर में और सिर्फ थियेटर में फिल्म देखने जायें। अच्छी फिल्मों का बाक्स आफिस में सफल होना बहुत जरूरी होता है (और ऐसा हर बार हर अच्छी फिल्म के साथ नही हो पाता), इस तरह की फिल्म बनाने वालों के लिये प्रेरणा देने के लिये।
फिल्म की शुरूआत से ही इसके चुभने वाले डायॅलाग की उपस्तिथी का एहसास होने लगता है। जब भगत सिंह और आजाद की टोली के ऊपर डाक्यूमेंटरी बनाने वाली अंग्रेज लड़की सू (हिरोईन) का बजट ये कह के काट दिया जाता है कि ‘गाँधी पर फिल्म बनाती तो अच्छा होता क्योंकि गाँधी ज्यादा बिकता है चंद्रशेखर अली नही (सू बाद में बताती है अली नही आजाद), और जैसे कोई भी राष्ट्र परफेक्ट नही होता उसे परफेक्ट बनाते हैं हम (यानि जनता)।
कल और आज अगर देखो तो ऐसा क्यों लगता है कि कल भी (गुलामी के वक्त) पुलिस में अपने ही लोग थे जो किसी के कहने पर बिना कुछ सोचे समझे अपने ही लोगों पर लाठी और गोली बरसाते थे और आज (जब हम आजाद हैं) भी पुलिस में अपने ही लोग हैं और ये आज भी अपने ही लोगों पर लाठी और गोली वैसे ही बरसाते हैं। और यही हाल आम जनता का है, बगैर सोचे समझे किसी के भी पीछे हो लेती है। देखा जाये तो ये आम जनता और पुलिस उन भेड़ों की तरह हैं जो बगैर किसी के हांके समूह में अपने आप नहीं चलते। पहले अंग्रेजों ने हांकले वालों की जगह ले रखी थी अब भ्रष्टाचार और स्वार्थी नेताओं (कतिपय नेता अपवाद हो सकते हैं) ने।
फिल्म का पहला हिस्सा हल्का फुल्का मनोरंजन से भरा है और आज के बेफिक्र युवाओं को दिखाता है जिनका देश से और उसमें होने वाली घटनाओं से कुछ लेना देना नही है। लेकिन फिर सू की मदद करते करते उनको ऐहसास होने लगता है उन कुर्बानियों का जो देश आजाद कराने में लोगों ने दी थी। भावनाओं के इस इस्थांतरण के दौरान डीजे (आमीर) कहता है, ‘हमारा एक पैर तो पास्ट (भूत) में होता है और एक फ्यूचर (भविष्य) में और आज (प्रेजेंट) में हम मूत (पी) ते रहते हैं।
दिल्ली इतनी सुंदर पहले नही लगी (फिल्म में दर्शायी बावली शायद वही हो जिसका जिक्र सुनीलजी ने अपने एक पोस्ट में किया था)।, सिनेमेटोग्राफी कमाल की है (विनोद प्रधान), गीत और डायलाग (एड मैन प्रसून जोशी) बहुत ही अच्छे और चुटीले हैं। संगीत (रहमान) भी काफी मस्ती भरा है, कुछ एक गाने तो बहुत ही बढ़िया बन पड़े हैं। कहानी और उसका प्रस्तूतीकरण भी बिल्कुल अलग है। फिल्म का कानसेप्ट और डायरेक्शन ऐवन है। सभी ने बड़ी अच्छी अदाकारी की है। कुल मिलाकर ये फिल्म कुछ हंसाती है, कुछ रूलाती है और कभी कभी सोचने पर भी मजबूर करती है। राकयेश और टीम बधाई की हकदार है एक अच्छी फिल्म देने के लिये।
फिल्म में ऐसा कुछ भी नही था जिसके लिये वो कांट्रोवर्सी होनी (एयर फोर्स और मेनका) बनती थी। अब आखिर में, ये फिल्म चलेगी कि नही तो इतना ही कहूँगा कि उन शहरों में जहाँ के दर्शक मनोरंजन के नाम पर हीरो हीरोईन के पेड़ के चारों ओर नाचना गाना, रूठना मनाना पसंद करते है वहाँ यह फिल्म शायद ना चले बाकी जगह इसका हिट होना तय है।
अब आप भी उठये और मस्ती की पाठशाला में जाकर रंग दे बसंती से थोड़ा रूबरू हो जाईये।
3 Responses
प्रदीप ममगाईं
January 30th, 2006 at 3:55 am
1I will have a look at it. I like aamir khan.
आशीष कुमार
February 1st, 2006 at 9:46 am
2आपको यहां शिकार बनाया गया
आशीष
SV
February 3rd, 2006 at 7:44 am
3I saw the movie and liked it. - SV
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