अगर तुम ना होते
मैं इस नाम की फिल्म की बात नहीं करने जा रहा बल्िक एक काल्पनिक लेख की बात कर रहा हूँ। धार्मिक भावना वाले व्यक्ति को हो सकता है इसे पढ़ के ठेस पँहुचे (जिसका मेरा कतई इरादा नही है), इसलिये गुजारिश है कि वो इसे या तो ना पढें और या फिर निठल्ला चिंतन समझ पढ़ने के बाद भूल जायें।
ना जाने ये कलयुग का असर था या राक्षस योनि में जन्म लेने का असर, बार-बार पृथ्वीवासियों द्वारा अपने को ‘घर का भेदी’ कहे जाने से क्षुब्ध हो एक दिन विभीषण राम के पास गुस्से में पहुँच गये। पहुँचते ही जैसे विभीषण ने बोलना शुरू किया कि पास में खड़े लक्ष्मण की भौंह हमेशा कि तरह टेढ़ी हो गयी, ये क्या तमीज हुई ना दुआ ना सलाम, प्रभु की इतनी बेइज्जती। राम ने उन्हें शांत कर विभीषण से उनके आने का कारण पूछा।
प्रभु बार-बार अपने को ‘घर का भेदी’ कहा जाता हुआ अब नही सुना जाता। आप ही बतायें कुभंकरण ने भी तो रावण को कहा था सीता मैय्या को लौटा देने को, रावण के नहीं मान ने पर आपके खिलाफ लढ, मृत्यु को प्राप्त कर शांति पाली। और मैं जिसने रावण के खिलाफ जाकर आपकी मदद की उसे अपमान के इस घुंट से रोज रोज मरना पड़ता है, अन्याय के खिलाफ जाने का क्या ये ही फल है। वहाँ देखिये जरा, अफगानिस्तान और इराक तो इस तरह से घर के भेदियों से भरा पड़ा है, लेकिन उन्हें तो सिर्फ शाबासियां मिल रही हैं। उन देश के शासनों ने तो सीता मैय्या को उठाने जैसा कोई अपराध भी नहीं किया।
आप ही बताओ हनुमान जी की पुँछ में आग लगवाने वाले प्लान की भूमिका किसने रखी थी, और सारी वाही वाही हनुमान ले गये। वो तो शुक्र मनाईये कि उन्हें सीता मैय्या मिल गयीं नही तो कहीं संजीवनी पर्वत की तरह, पूरी लंका ही उठा लाते कि ‘लो प्रभु ये रही लंका ढूंढ लो इसमें सीता मैय्या कहाँ है’। भला बताईये आप का क्या इतना गुणगान होता, सुमेर वैध का पता नहीं बताता तो कहानी वहीं खत्म थी। अगर मैं रावण की नाभि का भेद नहीं बताता तो आप अभी तक रावण के सर काट रहे होते, और वह नामाकुल राक्षसी हँसता रहता और उसके सिर जुड़ते रहते। ना कभी रावण मरता, ना आपका कहीं मंदिर बनता और ना ही इन पृथ्वी वासियों को दशहरे की छुट्टियां मिलती जो हर बार ‘घर का भेदी लंका ढाये’ कहते रहते।
जहाँ देखिये आपके ही मंदिर हैं, आपकी ही जय-जयकार है, यहाँ तक की आपके नाम को लेकर सरकारें बन रहीं हैं, गिर रहीं हैं। लेकिन उन बेचारे भरत की कहीं कोई चर्चा नहीं। अगर वो अयोध्या में गद्दी संभाल राज करने लग जाते और आपको नही लौटाते तो आप क्या करते, ज्यादा से ज्यादा लंका के ही राजा बनते ना। आपके मंदिर वहाँ बनते, दशहरे की छुट्टियां वहाँ होती। आखिर क्यों आपको मर्यादा पुरूषोत्तम कहतें हैं, आपने सिर्फ पुत्र की ही मर्यादा तो निभाई, पति और पिता की मर्यादा निभाने में तो आप से भी चुक हो गयी - सीता मैय्या को अग्नि परीक्षा देने को कहा, एक साधारण से धोबी के कहने पर गर्भावस्था में, सीता मैय्या के अग्नि परीक्षा देने के बावजूद घर से निकाल दिया।
विभीषण जो मन में आया बोले जा रहे थे, लक्ष्मण आखिर तेश में आ ही गये और बोले - ऐ विभीषण! संभल के बात कर, सूर्पनखा की नाक काटी थी तुम्हारी जबान छीन ली जायेगी। तुम यहाँ अपने अपमान का रोना रोने आये हो या राम भैय्या को अपमानित करने। लक्ष्मण के क्रोध से वाकिफ विभीषण जल्दी से हाथ जोड़ बोले क्षमा प्रभु क्षमा! अपमान के दंश ने मेरी बुद्वि हर ली।
मुस्कुरा के प्रभु बोले, ‘मानव का स्वभाव ही ऐसा है, विभीषण। तुम ही बताओ जिस मानव ने सीता को नहीं छोड़ा और उस तुच्छ मानव के कहने पर मुझे सीता को निकालके अपने लिये कंलक लेना पड़ा वो भला तुम्हारी कहाँ से कद्र करेगा। तुम तो वैसे भी उनके लिये दूसरे देश के वासी हो। और जो कुछ भी हुआ वह सब तो पहले ही लिखा गया था, मैं मानता हूँ मानव का मन पड़ने में जरा थोड़ी भूल हो गयी और दो-चार ऐसी बातें हो गयीं जो नहीं होनी चाहिये थी। लेकिन अब तो कुछ नहीं हो सकता इसलिये इतना ही कह सकता हूँ -
राम अभी भी रावण से लड़ रहे होते,
रावण के भाई विभीषण, अगर तुम ना होते।
अपनी महत्ता प्रभु के मुँह से सुन विभीषण की छाती थोड़ा चौड़ी हो गयी वो खुशी-खुशी राम को प्रणाम कर अपने निवास की ओर प्रस्थान कर गये।
विभीषण के जाते ही लक्ष्मण बोले, ये क्या इतनी बातें सुनकर भी आप तनिक गुस्सा नहीं किये उल्टा विभीषण की ही तारीफ कर दी।
प्रिय लक्ष्मण एक बात याद रख लो, विभीषण चाहे हमारे युग का हो या इस युग का, जंग जीतने में हमेशा काम आता है। दो देशों के उदाहरण तो वो खुद ही दे गया, विभीषण हो या साधारण मानव अगर उसके अहं को सहलाओगे तो हमेशा तुम्हारे काम आयेगा। अगर मैं अभी क्रोध करता, और कल फिर से धरती पर जाना पड़ गया तो हमारी मदद के लिये विभीषण कहाँ से आयेगा। राम की बात सुन लक्ष्मण बोले -
समझ गया मैं सब भ्राता, मंदिर में, मैं भी जगह ना पाता।
दशरथ नंदन श्री राम, मेरे बड़े भाई, अगर तुम ना होते।
लक्ष्मण के इतना कहते ही दोनों भाई जोर से हँस पड़े और राम सोच रहे थे, चलो लक्ष्मण भी दुनियादारी की बातें समझने लगा है, क्यों ना अगली बार अपना और सीते वाला रोल इसके और उर्मिला के लिये लिखवा दूँ।
वाह, अच्छा लेख है, काफ़ी हद तक सच भी है। विभीषण की सहायता/परामर्श बिना न तो लंका फ़ूँकी जाती, न राम-लक्ष्मण की मूर्छा टूटती और न ही रावण मरता, परन्तु फ़िर भी जयजयकार राम-लक्ष्मण की ही होती है, उस भरत की भी नहीं जिसने 14 वर्ष सन्यास में भ्रातृ प्रेम के कारण काटे और अपनी मर्यादा निभाई!! परन्तु रही बात विभीषण को “घर का भेदी लंका ढाए” कहकर अपमानित करने की बात, तो जहाँ तक मैं जानता हूँ, रावण ने(जब विभीषण ने रावण की मृत्यु का रहस्य श्रीराम को बताया था) मरते समय विभीषण को यह शाप दिया था कि वह सदैव घर के भेदी के रूप में जाना जाएगा और अपमान का भोगी बनेगा।
वैसे यह सही भी है कि मानव का स्वभाव ही ऐसा है, जो कि असली जयजयकार के योग्य होते हैं उन्हे तो कुछ मिलता नहीं, लेकिन जो लीडर होते हैं वो वाहवाही लूट ले जाते हैं जबकि उनका कोई इतना योगदान भी नहीं होता। अब महाभारत में से ही लीजिए, बच्चा बच्चा जानता है कि कौरव गन्दे थे जिन्होंने पांडवों के साथ छल किया और उनसे युद्ध किया, पर शायद ही कोई जानता हो कि युयूत्सु अपने कौरव भाईयों का साथ छोड़ पांडवों की ओर से लड़ा था क्योंकि वह जानता था कि वे सही हैं। अर्जुन को सभी महानायक कहते हैं जिसने कर्ण का वध किया, परन्तु यह ज्यादा लोग नहीं जानते कि श्रीकृष्ण के अलावा मद्र नरेश शल्य(नकुल-सहदेव के मामा) जो कि कौरवों की ओर से लड़े(बाद में कौरवों के प्रधान सेनापति बनें और युधिष्ठिर के हाथों मारे गए) और कर्ण के सारथी भी बनें, उनका कितना बड़ा हाथ है, क्योंकि कौरवों के पक्ष में लड़ने के बावजूद वे पांडवों के हित की बात करते थे और अर्जुन की बड़ाई करके कर्ण के साहस को हमेशा कम करके उसे कमज़ोर बनाते रहते थे। ऐसे और अन्य उदाहरण भी हैं।
वास्तविक जीवन में भी यही होता है भईये, करता कोई है, श्रेय कोई और ले जाता है, यही जीवन का सत्य है!!
इसी कारण मुझे अंग्रेज़ी फ़िल्म “ट्रौय” का वह दृश्य याद आ जाता है जब अकिलीस और ऐगामेमनान में ट्रौय का समुद्र तट जीतने के बाद विवाद चल रहा होता है और अकिलीस कहता है कि सिपाहियों ने उस दिन की जंग जीती थी, तो ऐगामेमनान उत्तर देता है कि इतिहास राजाओं को याद रखता है, सिपाहियों को नहीं!! वाकई उसकी बात में सच्चाई है, आखिर सिपाही लाखों की तादाद में होते थे और राजा सिर्फ़ एक, तो किसे याद रखना आसान है!!
और वैसे भी, इतिहास तो राजा ही लिखवाते आए हैं, तो वे भला अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में क्यों न लिखवाएँ!! 
आपने बहुत बढिया लेख लिखा है। अपना साथ देने वाले को कभी भूलना नहीं चाहिए। आपके लेख के अन्त में जैसे राम ने विभीषण की प्रशंसा की है, उसी तरह अगर कुछ और न कर सको तो कम-से-कम आखिर में मदद करने वाले की थोड़ी-बहुत तारीफ़ तो कर ही देनी चाहिए।
बढ़िया लेख लिखा है।
बहुत खूब |
रिपुदमन