अंधेर नगरी, सभी हैं राजा
एक बार मैं जब ‘अमेजिंग रेस’ (लाजवाब दौड़) देख रहा था तब किसी प्रतियोगी ने भारत (लखनऊ और उदयपुर शायद) से वापसी का हवाई जहाज पकड़ते वक्त बोला था, “ओ.के, बैक टू सिविलाईजेसन’। उस वक्त सच मानिये तो बहुत चुभी थी ये बात। लेकिन इस बार जब मैं इंडिया होकर वापस आया तब मुझे लगा कि एक ऐसे व्यक्ित के लिये जो ताउम्र अमेरिका से बाहर ना गया हो वो सब कहना स्वाभाविक ही था।
भारत में अपना रैन बसेरा ‘मंगल-मंगल’ के ही शहर में था और ये शहर ‘अंधेर नगरी’ का अक्षरशः पुरक बनता जा रहा है। काफी दिनों से भारत के सुपर पावर बनने की ओर बड़ते कदमों की आहट इंटरनेट के माध्यम से सुनते आ रहे थे। आजकल जिसके पास देखो मोबाइल है, सबके घरों के आगे एक कार है, घर में कंप्यूटर है, किसी किसी के पास इंटरनेट का कनेक्शन भी है, बस अगर कुछ नही है तो वो है बिजली। जी हाँ यहाँ बिजली बामुश्किल ८-१० घंटे रहती है उसमें से भी ४ घंटे आधी रात के १२ से ५ बजे के बीच, बाकी वक्त किश्तों में आती है यानी २-२ घंटे सुबह, दिन में और शाम - जैसे किसी डाक्टर ने नुस्खा बताया हो दो गोली सुबह, दिन और शाम। आजकल सुनने में आया है कि उत्तर प्रदेश के ज्यादातर नगरों और महानगरों के यही हाल हैं। कई कारणों में से एक कारण है कि यहाँ से बिजली दिल्ली-नोएडा की जगमगाहट बरकरार रखने के लिये सप्लाई की जा रही है।
देश के चंद शहरों को जगमगाने का ये दांव कहीं ऐसा ना हो कि उल्टा पड़ जाय, ये कोई सोच नहीं रहा है या सोचना नही चाहता। हर कोई चाहता है - दिल्ली, बैंगलोर, मुम्बई, चैन्नई, हैदराबाद, पुने जैसे शहर में विकास होता रहे। क्योंकि यही तो वो शहर हैं जहाँ बाहर से जनता आती रहती है और फिर भारत के विकास का लिखती रहती है।
लेकिन एक अंधा सच ये भी है कि एक दिन इन्हीं शहरों की ओर देश के बाकी पिछड़ रहे शहरों से जनता पलायन करेगी। आज मुम्बई में कोई बाहर से (बिहार से) आने वालों का रोना रोता है कल बाकी भी रोयेंगे। दिल्ली विकास के नाम पर एक ओर फ्लाई ओवर से पट गयी है वहीं ट्रैफिक पहले से भी ज्यादा हो गया है। भीड़ पहले से भी ज्यादा है और यह सब लोग आ रहे हैं पिछड़ते जा रहे शहरों से रोजगार की तलाश में। रोजगार की इस कशमकश में अपराध में भी इजाफा हो रहा है। कुछ एक प्रमुख शहरों को छोड़ दिया जाय तो अभी भी सरकारी फोन (बी.एस.एन.एल) लगवाने में ४-५ महीना लगना आम बात है। उत्तरांचल का अच्छा हुआ उत्तर प्रदेश से अलग होकर, थोड़ा बहुत विकास तो होने लगा है, उ.प्र तो पिछड़ने की ओर अग्रसर है।
इस बार के सफर में एक बात तो तय हो गयी कि चाहे कुछ हो जाय उत्तर प्रदेश में सड़क से सफर नहीं करना है। सड़कों के तो इतने बुरे हाल हैं कि पुछिये मत, दिल्ली देहरादून राजमार्ग में एक जगह पर तो इतने बड़े-बड़े गड्ढे हैं कि आप ये तय करने में लग जायेंगे कि गाड़ी दायीं तरफ गिरेंगी या बायीं तरफ, हड्डियों से बजने वाला संगीत रहमान को भी पीछे छोड़ दे। अगर आपको लगे कि अतिश्योक्ित है तो स्वागत है आपका जाईये और इस रोमांचकारी सफर का स्वयं मजा लिजये। वैसे शायद आने वाले समय में राजमार्ग तो ठीक हो जाय, लेकिन राजमार्गों को जोड़ने वाली सड़कों की कोई गारंटी नजर नही आती।
बहरहाल अंधेर नगरी के बाद आते हैं ‘सभी हैं राजा’ के ऊपर। एक बात तो सभी मानेंगे कि भारत से बड़ा और भारत जैसी डेमोक्रेसी कहीं भी नही है। ये वो देश है जहाँ शेर और बकरी एक ही घाट पे पानी पीते हैं अर्थात यहाँ एक ही सड़क पर आपको सभी विचरण करते मिल जायेंगे - पैदल, कार, स्कूटर, साईकिल, रिक्शा, ट्रक, बस, भैंस गाड़ी, गाय-जानवर। आप नाम लिजिये आजू बाजु चलते हुए कहीं ना कहीं दिख जायेंगे। और अगर आप किस्मत वाले हुये तो किसी ना किसी राजनीतिक पार्टी से संबन्धित कुछ लोग किसी ना किसी बात पे उसी सड़क पर अपना विराध दिखाते हुये मिल जायेंगे। और यह सब दिखेगा आपके अपने ही किसी शहर की वही ४-५ फुट चौड़ी सड़क पर। मजाल है कोई किसी से घबरा रहा हो। हर किसी को एक दूसरे से आगे निकलने की जल्दी है। सभी यही मानते हुए सड़क पर ऊतरते हैं कि बस हम ही हैं राजा, इसलिये पहले हम जायेंगे फिर दूसरा। सड़क में निकलने पर लगता है जैसे गाड़ियों और इंसानों के बीच संख्या की दौड़ छीढ़ी हो, देखें कौन पहले आगे निकलता है।
इतना सब कुछ होने पर भी ये निठल्ला बगल में बैठा कह रहा है -
सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दुस्ताँ हमारा।
अंधेरी चाहे नगरी, फिर भी हम हैं राजा।












This post has 6 comments
January 18th, 2006
आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। सपनों के ‘सुपरपावर इण्डिया’ और वास्तविकता के ‘खस्ताहाल हिन्दुस्तान’ में भारी फ़र्क है। भारत के शहरों को ही देख कर अगर अमरीकियों की हालत खराब हो जाती है, तो कस्बों और गाँवों को देख कर क्या हाल होगा? औरैया में, जहाँ पहले मैं रहता था, दिन में ज़्यादा-से-ज़्यादा पाँच-छ: घण्टे ही बिजली आती थी। और अगर ट्रांसफ़ार्मर फुक जाए, तो दो-तीन महीने तक बिजली के दर्शन नहीं होते थे।
January 19th, 2006
बिजली की स्थिती खराब तो है लेकिन सुधार लाने का काम भी हो रहा है. खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों मे, और भी कई राज्य हैं, जहाँ गाँव में ,हरेक गरीबी रेखा के नीचे वाले घरों में विधुतिकरण का काम चल रहा है और सारी रुकावटों ( ये आप भी समझ रहे होंगे कि कौन सी रुकावटें ) के बावजूद, बखूबी चल रहा है.
मैं जानती हूँ क्योंकि “राजीव गाँधी ग्रामीण विद्ध्युतिकरण योजना ” में हम, (यानि पावर ग्रिड,जहाँ मैं काम करती हूँ और इसी काम की वित्तिय सहमति मेरे कार्य क्षेत्र में है) यही काम कंसलटैंट के तौर पर कर रहा है.
एक बार अँधों को दिखाई दे जाय फिर देखिये अँधेरे से लोग कैसे नहीं लडते. कुछ समय, बहुत सारा विश्वास और ढेर सारी लगन और जोश चाहिये. हम आगे बढ रहे हैं धीरे धीरे ही सही.
प्रत्यक्षा
January 19th, 2006
बहुत सही बरखुरदार
बुलन्द भारत की बुलन्द तस्वीर….हमारा निठल्ला चिन्तन.
है कि नही? अच्छा लेख लिखे हो।
रही बात बिजली पानी की, तो भैया, सारे सुख मिल जायेंगे तो लोगों की समस्याये खतम हो जायेंगे और वे नेताओं के पीछे डन्डा लेकर निकल पड़ेंगे, इसलिये नेताओ की साजिश है, जनता को अभावों मे सड़ने दो, ताकि कुछ सोचने समझने की शक्ति ना रहे। यही तो है गेम प्लान।
January 19th, 2006
@प्रतीक, शहरों के वाकई में यही हाल हैं।
@प्रत्यक्षा, विधुतिकरण के लिये आपका कहना सही है, लेकिन समस्या वहाँ नही है। असली समस्या है उसके बाद विधुत की आपूर्ति की। क्योंकि जितनी खपत है उसका तीन चौथाई भी बिजली का उत्पादन लगता है नहीं हो रहा।
@जीतू भाई, गेम प्लान तो बड़ा ही खतरनाक है बिल्कुल फिल्म काँटे जैसा। याद है ना उसमें आखिर में एक ही बचता है। कसम से जो भी बचेगा उसके तो वारे न्यारे हो जायेंगे। और बाकी सारे सुख का तो पता नही बस बिजली, पानी, सड़क तो शायद बुनियादी जरूरत की चीजें हैं।
January 19th, 2006
विधुत आपूर्ति की योजना भी है. कई सुपर थरमल प्रोजेक्ट्स भी आ रहे हैं. बहुत मुमकिन है कि सब कुछ सिंक्रोनाईज़्ड न हो पर कदम बढ रहा हैं आगे,
कुछ न कुछ तो बेहतर आवश्य होगा ऐसा मेरा विश्वास है.
February 3rd, 2006
Very well said!
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