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यहाँ महमूद का गाया कोई गीत नही सुनाया जा रहा बल्‍कि ऐसा ही कुछ कहना है मेनका जी का। मेनका कौन? अरे वही जो ‘एनीमल वेलफेयर बोर्ड आफॅ इंडिया’ (AWBI) की सदस्‍या हैं, और संयोग से नेता भी। ये सारा हल्‍ला-बोल हो रहा है आने वाली नई फिल्‍म ‘रंग दे बसंती’ में हुए कुछ घोड़ों के इस्‍तमाल पर।

इनका कहना है, कानून के अनुसार इस संस्‍था से इजाजत लिये बगैर कोई किसी जानवर को अपनी फिल्‍म में कोई भी रोल नहीं दे सकता। यानि एक बार इजाजत ले लो फिर चाहे हीरो बनाओ या विलेन इनको मतलब नही। अब राकयेश (कुछ गलत नहीं लिखा इनका नाम ही ऐसा है) साहेब ने पहले घोड़ों से अदाकारी करवा ली, और उसके बाद इजाजत पत्र भेजा, मादाम को तो बिफरना ही था। हम तो धन्‍य हो गये ऐसी संस्‍था देश में पा कर। जिन्‍हें ये चिन्‍ता बिल्‍कुल नही कि ना जाने कितने जानवर (कुत्ते, गधे, गाय वगैरह) या कहना चाहिये लावारिस जानवर गली, सड़क और यहाँ तक की हाइवे में आजाद घूमते हैं, यातायात की ऐसी तेसी तो करते ही हैं, साथ ही अपनी और गाड़ी चलाने वाले की जान के लिये भी खतरा बने रहते हैं। इनका किसी संस्‍था और व्‍यक्‍ति को ख्‍याल नहीं और दो अदद घोड़ों की चंद मिनट की अदाकारी पर हल्‍ला होने लगा, कुछ लोगों को दर्द उठने लगा। भैंसा गाड़ी या बुग्‍गी (घोड़ा या खच्‍चर गाड़ी) में इन बेचारे निरीह जानवरों की क्षमता से कहीं अधिक बोझा (वजन) लादे लोग इधर-उधर सामान ढोंते रहते हैं तब किसी को दर्द नही होता। बस फिल्‍म में इस्‍तेमाल से पहले इन से पूछो, भैय्‍या ऐसा भी क्‍या कानून जिसके तहत गली में कुत्ता चाहे बगैर पूछे काट ले लेकिन फिल्‍म में इस संस्‍था से पूछे बगैर कुत्ते को भी काटना मना है।

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