निठल्ले दोहे
मेरा तेरा करता रहता ये सारा संसार,
खाली हाथ सभी को जाना छोड़ के ये घरबार।
उत्तर, दक्षिण, पूरब पश्चिम, चाहे तुम कहीं भी देखो,
वही खुदा है सब जगह, घर देखो या मंदिर देखो।
जब से जोगी जोग लिया, और भोगी ने भोग लिया,
तब से ही इस कर्म गली में, कुछ लोगों ने ढोंग लिया।
पहन के कपड़े उज्जवल देखो, वो चला मंदिर की ओर,
मन के चारों ओर लिपटी है, गंदगी की डोर।
आज घटी एक घटना, कल बन जायेगी इतिहास,
पैर फिसल के गिरा बेचारा, लोगों के लिये परिहास।
कहीं जल रहे दीप, कहीं मातम का माहौल है,
इसका उल्टा होगा एक दिन, क्योंकि दुनिया गोल है।
चलो बहुत हुआ रोना धोना, सुनते हैं संगीत,
‘तरूण’ प्यार के गीत सुनाओ, सभी हमारे मीत।
अनूप जी के हाइकु टेस्टिंग जैसे आपके दोहे पढे। पहला और आखिरी दोहा अच्छा बन पडा है। वैसे दोहे लिखने का एक विशेष छंद होता है।
१३,११। १३,११॥ मात्रायें होती हैं, दूसरे व चौथे पद में आखिरी मात्रा लघु होना ज़रूरी होता है, आदि। आप अभिव्यक्ति पर इसकी ज़्यादा जानकारी ले सकते हैं।
बहुत बढिया। मानोशी जी से कहना चाहूँगा कि ये दोहे इसीलिये तो ‘निठल्ले दोहे’ हैं, क्योंकि ये मात्रा-छन्दादि नहीं मानते।
Shukriya Pratik bhai, mera jawab to tumne hi de diya.
Manoshi ji taarif ka shukriya aur dohe ke baare me thora gyan dena ka bhi dhanywad, inhi baaton ke chalte jaisa pratik ne keha mene inhe naam diya ‘Nithalle dohe’, jisse matra chand aadi ka tension hi na rahe.