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परित्रना – एक नई राजनीतिक पार्टी

पहले पांच पांडव, फिर रंग दे बसंती के पांच युवा और अब आई आई टी के ये पांच नवजवान। अच्‍छे खासे कैरियर को लात मार देश की हालत सुधारने का बीड़ा उठाया, और एक नयी राजनीतिक पार्टी की नींव रखी, जिसका नाम है – परित्रना, जिसका मतलब होता है विभिन्‍न कारणों से मिली मुश्‍किलों से [...]

[ More ] January 30th, 2006 | 2 Comments | Posted in खालीपीली |

रंग दे बसंती

अगर आप सोचते हैं कि रंग दे बसंती एक देश भक्‍ति की फिल्‍म है तो आप गलत सोचते हैं, और अगर आप सोचते हैं कि रंग दे बसंती एक देश भक्‍ति की फिल्‍म नहीं है तो भी आप गलत सोचते हैं। क्‍यों खा गये ना गच्‍चा, यही इस फिल्‍म की तारीफ है कि फिल्‍म खत्‍म [...]

[ More ] January 28th, 2006 | 3 Comments | Posted in फिल्म समीक्षा |

इतिहास कहीं परिहास ना हो जाये

अगर आप को स्‍कूल के बच्‍चों के पाठयक्रम के लिये अमेरिका का इतिहास लिखने के लिये कहा जाय तो आप क्‍या करेंगे। यही ना कि अमेरिका में उन लोगों से सम्‍पर्क करेंगे जिन्‍होने वहाँ के स्‍कूल के लिये इतिहास का पाठयक्रम लिखा हो या फिर अमेरिका के किसी एक या दो इतिहासविद्‌ से सम्‍पर्क कर [...]

[ More ] January 24th, 2006 | 3 Comments | Posted in खालीपीली |

अगर तुम ना होते

मैं इस नाम की फिल्‍म की बात नहीं करने जा रहा बल्‍िक एक काल्‍पनिक लेख की बात कर रहा हूँ। धार्मिक भावना वाले व्‍यक्‍ति को हो सकता है इसे पढ़ के ठेस पँहुचे (जिसका मेरा कतई इरादा नही है), इसलिये गुजारिश है कि वो इसे या तो ना पढें और या फिर निठल्‍ला चिंतन समझ [...]

अंधेर नगरी, सभी हैं राजा

एक बार मैं जब ‘अमेजिंग रेस’ (लाजवाब दौड़) देख रहा था तब किसी प्रतियोगी ने भारत (लखनऊ और उदयपुर शायद) से वापसी का हवाई जहाज पकड़ते वक्‍त बोला था, “ओ.के, बैक टू सिविलाईजेसन’। उस वक्‍त सच मानिये तो बहुत चुभी थी ये बात। लेकिन इस बार जब मैं इंडिया होकर वापस आया तब मुझे लगा [...]

[ More ] January 18th, 2006 | 6 Comments | Posted in समाज और समस्‍या |

मेरी भैंस को डंडा क्‍यों मारा

यहाँ महमूद का गाया कोई गीत नही सुनाया जा रहा बल्‍कि ऐसा ही कुछ कहना है मेनका जी का। मेनका कौन? अरे वही जो ‘एनीमल वेलफेयर बोर्ड आफॅ इंडिया’ (AWBI) की सदस्‍या हैं, और संयोग से नेता भी। ये सारा हल्‍ला-बोल हो रहा है आने वाली नई फिल्‍म ‘रंग दे बसंती’ में हुए कुछ घोड़ों [...]

[ More ] January 13th, 2006 | 1 Comment | Posted in फिल्‍म, राजनीति |

नि‍ठल्‍ले दोहे

मेरा तेरा करता रहता ये सारा संसार, खाली हाथ सभी को जाना छोड़ के ये घरबार। उत्तर, दक्षिण, पूरब पश्‍चिम, चाहे तुम कहीं भी देखो, वही खुदा है सब जगह, घर देखो या मंदिर देखो। जब से जोगी जोग लिया, और भोगी ने भोग लिया, तब से ही इस कर्म गली में, कुछ लोगों ने [...]

[ More ] January 3rd, 2006 | 4 Comments | Posted in शायरी और गजल |