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द राइजिंगः Ballad of Mangal Pandey

August 14th, 2005 | No Comments | Posted in फिल्म समीक्षा

द राइज़िंग एक गंभीर सिनेमाई प्रयास है। यह राइजिंग सिर्फ एक सिपाही मंगल पांडे के बारे में नही बल्‍िक पूरे आवाम की जागृति के बारे में है। एक बहुत ही अच्‍छा सामुहिक प्रयास है, सभी क्षेत्रों में अच्‍छा काम किया गया है चाहे हो एक्‍टिंग हो, या हिमान धमिजा कि सिनेमेटोग्राफी, और या रहमान संगीत या जावेद अख्‍तर के गीत या फिर केतन मेहता का डायरेक्‍शन। मंगल मंगल के बोलों से शुरू होती इस फिल्‍म का यह टाईटिल गीत बड़ा ही स्‍फुर्तिदायक है, कैलाश खेर ने इसे बहुत ही सुन्‍दर तरीके से गाया है।

यह मूवी सिर्फ भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम के शुरू होने की कहानी नही है वरन्‌ दोस्‍ती के बारे में है, उस वक्‍त की सामाजिक विडंबनाओं के बारे में है, ईस्ट इंडिया कंपनी की घिनौनी हरकतों और कंपनी अफ़सरों के अफ़ीम के अवैध व्यापार के बारे में है, साथ ही यह भी दिखाती है कंपनी की आधी से ज्‍यादा फौज भारतीयों से भरी थी। मंगल पांडे के बारे में बहुत कम उपलब्‍ध होने के बावजूद केतन और टीम एक अच्‍छा एंड प्रोडक्‍ट लाने में सफल रही। कहीं पर हो सकता है कि आपको लगे की फिल्‍म थोड़ा धीमी हो चली है या थोड़ी खिंच रही है लेकिन जब तक आप बोर होने लगे या इस बारे में सोचने लगे फिल्‍म फिर से अपने लय में आ जाती है। भारत की स्‍वतंत्रता के विषय को लेकर काफी फिल्‍म बनायी गयी हैं लेकिन उन में से सिर्फ कुछ ही उस वक्‍त की सामाजिक बुराईयों को दिखाने में सफल होयी हैं, राइजिंग उनमें से ही एक है।

फिल्‍म का ऐतिहासिक विषय में बना होना ही इसका एक नकारात्‍मक पहलू है और वह भी इसलिये क्‍योंकि सभी को अंत पता होता है। लेकिन क्‍या यह बालीवुड में बनने वाली ९९ प्रतिशत मूवी के लिये सत्‍य नही है। क्‍लाईमेक्‍स वाकई में बहुत ही जबरदस्‍त है, अंत तक आते आते यह फिल्‍म बताती है कि इस पवित्र आंदोलन में चर्बी गौण और आत्मसम्मान प्रमुख हो जाता है। और कहानी को आगे बड़ाने में ली गयी ओमपुरी की आवाज बरबस “भारत एक खोज” नाम के टीवी सीरियल की याद दिलाती है।

कुल मिलाकर फिल्‍म पैसा वसूल है लेकिन इतना भी नही कि एक अच्‍छा कलाकार अपने को सिर्फ इसी प्रोजेक्‍ट के लिये ४ साल तक समर्पित कर के रखे। आमीर की अदाकारी में कलाकार का यह समर्पण साफ साफ दिखायी देता है। और अंत में, सावधान अगर आप चोपड़ा और जौहर की टाईप की मूवी के हार्डकोर फैन (जबरदस्‍त प्रशंसक) हैं तो आपके लिय बेहतर होगा कि आप फिल्‍म के डीवीडी में आने की प्रतीक्षा करें। साथ ही सतही मनोरंजन से बिगड़ी हुई रूचियों वाले पॉपकॉर्न दर्शकों के लिए भी यह फिल्‍म दालबाटीनुमा भोजन ही साबित हो सकती है। अन्‍यथा अगर आप मेरी तरह यह सोचते हैं कि एक फिल्‍म को इतना अच्‍छा होना चाहिये कि वह थियेटर में जाकर देखी जा सके तो जा और “हल्‍ला बोल!

इस फिल्‍म के गीत आप यहाँ सुन सकते हैं।

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बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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