माजरा क्या है
पहले पढ़ सुन कर तो लगा इस बार बड़ा कॉमन सा विषय मिला है अनुगुँज के लिए, कॉमन इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि ये ३ शब्द अक्सर लोगों के मुहँ से एक दूसरे को कहते हुए सुने जा सकते हैं। मसलन, “अरे मिंयाँ आज बड़े चहक रहे हो ‘माजरा क्या है’ और या फिर कभी आफिस
में कोई सूट-बूट पहन के आ जाये तो सब उसे ऐसे देखते हैं जैसे पूछ रहे हों, भई ‘माजरा क्या है’। अब वैसे तो कुछ भी लिखने में ऐसी कोई बंदिश नही लकिन इसका मतलब यह नही कुछ भी परोस दिया जाय तो सोचा कुछ और सोचते हैं। यहीं असलियत का एहसास हुआ कि विषय जैसा दिखायी देता है वैसा है नही। चन्द लाईन लिखने के लिए ना ही दिमाग ने साथ दिया ना दिल ने। अब जब दिल और दिमाग साथ छोड़ दें तो भला कोई क्या कर सकता है, हम भी बैठ गये हाथ पर हाथ रख कर।
फिर कुछ दिनों बाद महावीर जी के लेख पर छपी फोटो और उसकी पीछे छुपी कहानी का पता चला। शांत बैठे दिल और दिमाग तो हकबका के खड़े हुए ही साथ में अंदर बैठे निठ्ल्ले ने भी अंगड़ाई ले ली। निठ्ल्ले के उठने से हमें इस बात का एहसास हो गया कि आगे की कहानी का तियां-पाँच होने वाला है। दिल और दिमाग के तेवर ने रंग दिखाया और सबसे पहले उस फोटो को लेकर अंग्रेजी ब्लोग में अपना आक्रोश कलमबद्व कर दिया। धांसू दिमाग में आइडिया आया कि इसी को ‘माजरा क्या है’ का पता लगा के पोस्ट कर दिया जाये, आम के आम गुठलियों के दाम या कह सकते हैं ‘हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा ही चोखा’।
जैसे ही एक धर्म विशेष के भगवान की फोटो मिलैनी निर्मित जूतों में देखी, दिमाग में रक्त ने उबाल लिया और दिल हाहाकार कर उठा, ये क्या एक बार फिर से ऐसा मंजर। इन व्यवसायिक लोगों को कोई और डिजाइन नहीं मिला। खूब गालियाँ निकाली, किसी की फोटो ऐसे जूतों में छापना……..हद है। यह मुआ अपनी ही फोटो क्यों नही छपता। अंदर से निठ्ल्ले की आवाज आयी, देखो मिंयाँ “सेक्यूलर होने का इससे अच्छा मौका फिर नही मिलेगा”।
अपनी समझ में बिल्कुल नही आया कि धर्म निरपेक्ष होने का जूतों से क्या ताल्लुक। इसलिए पूछ लिया, “वो भला कैसे”। निठ्ल्ला बोला, एक जोड़ी ये जूते ले लो, और फिर ऐसे ही एक-एक जोड़ी अलग-अलग धर्मों से जुड़े लोगों की फोटो छपे जूतों की ले लेना। अगर नही मिल पाये तो अपने देश में तो हर चीज का जुगाड़ है, इसका भी हो जायेगा। बस फिर, सुबह शाम जय-जय करना और दिन में शान से एक पांव में एक दूसरे मे दूजा पहन के निकलना। अलग-अलग धर्मों के देव एक साथ घुमने निकलेंगे, घर में ही मन्दिर, मसजिद, गुरूद्वारा और चर्च, सब एक जगह; मन्दिर और मसजिद का कोई झगड़ा ही नही। अब इससे बड़ी धर्म निरपेक्ष की कोई मिसाल मिलेगी।
दिल, दिमाग पर हावी हुआ तो हम निठ्ल्ले को बोले, तू तो मरेगा और हमें भी मरवायेगा। जानता भी है किस की बात कर रहा है, निठ्ल्ला बोला, हाँ उसी की जिसके लिये ना कुछ “हिंदू पार्टी के मुँह से सुनायी देता है”, “ना मुस्लिम” और ना ही “तथाकथित धर्म निरपेक्ष पार्टी के मुँह से”। बात में तो कुछ दम था, मुँह खोलते हुए तो हमने भी ना देखा, ना ऐसा कुछ सुना। लेकिन हमने निठ्ल्ले को सफाई दी, देख भाई अभी कोई इलेक्शन जो थोड़ी है जो ये ऐसी किसी बात पर मुँह खोलेंगे। इन्हें जब एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से फुरसत मिलेगी तो ये भी बोलेंगे। बोलने से कुछ नही बनेगा तो थोड़े दंगे करवा देंगे, अपने ही देश की जर जमीन जायदाद का नुकसान करवायेंगे…. “और उसके बाद एक दूसरे को इसका दोषी ठहरायेंगे”, निठ्ल्ले ने मेरी बात को पूरा किया।
अच्छा निठ्ल्ले एक बात बता इन्हें अपने ही देवगण क्यों मिलते हैं अपने डिजाइनर काम के लिए, आखिर “ये माजरा क्या है”। सिंपल, क्योंकि इन्हें पता है हम में से कुछ सेक्यूलर बने बैठे हैं, इसलिए कुछ कहेंगे नही; और कुछ शायद शर्म के मारे कुछ ना बोले, अब बचे कुछ चंद मुठ्ठी भर लोग, अगर इन्होंने हल्ला बोला तो ठीक नही बोला तो इनकी तो निकल पड़ी ना। दूसरा, बाकी सब के पास एक अपने पास छत्तीस करोड़ इसलिए भी प्रोबेबिलीटी थोड़ा बड़ जाती है। योग गया, आयुर्वेद गया शायद अब इसकी बारी हो। बात थोड़ा समझ में आ रही थी, हम दुनिया से “सर्व धर्म सद्भावना” कहते रहे और वो दुनिया वाले इसी तरह हमें गच्चा देते रहे। हम भी ताव में आने लगे थे, निठ्ल्ला बोला अब ज्यादा ताव खाने की जरूरत नही है, उन्होंने जूते वापस ले लिये हैं। हमने कहा जूते ही तो वापस लिये हैं अभी लिखित में माफी तो नही मांगी। निठ्ल्ला बोला इससे बड़ी बड़ी बात हो जाती है कोई माफी नही मांगता, “माफी मांगने से कोई छोटा नही होता ये गुजरे जमाने की बात थी” इस जमाने का दस्तूर नही। आज के इस दौर में माफी तभी मांगी जाती है जब अपना कोई काम हो नही तो हमको क्या। आखिर था तो हिंदुस्तानी खून, इतने से ही ठंडा पड़ गया, ऊपर से पढ़े लिखे होने ठप्पा. इस बात का भी तो डर था कहीं कोई अनपढ़ गंवार ना कह दे। हमें लग गया था हम बिल्कुल सीमा पर खड़े हैं, कब किस करवट जा बैठें हमें खुद नही पता।
ये तो बात हुई एक माजरे की अभी तो ऐसे ही ना जाने कितने माजरे पड़े हैं, उनके शब्द पहनाने की बजाय क्यों ना इंतजार किया जाय उस घड़ी का जब बजाय “माजरा क्या है” कहने के, हम कहें ओ हो अच्छा “तो माजरा ये है”। लेकिन फिर चलते चलते, निठ्ल्ले ने पीछे से दाग ही दिया - “२४ घंटे में मुश्किल से कभी १२ घंटे बिजली आती है, सड़कों की हालत पगडंडी जैसी होती जा रही है, कोर्ट में केस पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता है, देहली और बोम्बे को छोड़ कहीं कोई डेवलपमेंट नहीं इसलिये जनता इन्हीं शहरों को दौड़ी चली जाती है, कॉल सेंटर के अलावा कहीं कोई नौकरी नहीं, सरकारी नौकरी में आरक्षण के अलावा कोई काम नहीं, बिल जमा करने को अभी भी घंटों लाईन में लगना पड़ता है, फोन और इंटरनेट का कनेक्शन मिलने में अभी भी कई दिन लग जाते हैं, सरकारी बाबू अभी भी पैसे खाये बिना कुछ नही करते, पब्लिक स्कूल में इंगलिश और सरकारी स्कूल में हिंदी बदतसूर जारी है, अमीर और गरीब का फर्क बड़ता जा रहा है, नियम-कानून पर अभी भी किसी को भरोसा नही, सरकारी पार्टियां देश की आबादी की तरह बढ़ती हीं जा रहीं हैं, पहले किसी और की नीति थी “फूट डालो राज करो” और अब ये इन राजनीतिक पार्टियों की नीति है, जाती के नाम पर; भाषा के नाम पर; धर्म के नाम पर अभी भी सब लोग बंटे हुए हैं, अभी भी आधे से अधिक जनता अनपढ़ है, छूत छात अभी भी जारी है, महिलाओं को ज्यादातर लोग अभी भी पैर की धूल से ज्यादा नही समझते, इनफ्रास्ट्रकचर की अभी भी कोई बात नही करता……………फिर कुछ चंद लोग मीडिया में, न्यज पेपर में ये कैसे कहते रहते हैं कि अगले २५-३० सालों में हम एक सुपर पावर होंगे, दुसरे नम्बर पर होंगे वगैरह वगैरह….” आखिर कोई तो बताये, भला ये “माजरा क्या है”।


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There is so much of stuff on the interenet in Hindi! Bhaiya kaheen aap apne tarun joshi to naheen? Reply at dharnid AT yahoo . I was amazed to see that there is so much hindi being written on the net!! Kudos!!