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उत्‍पत्ति ‘निठल्‍ला चिन्‍तन’ की

May 8th, 2005 | 6 Comments | Posted in खालीपीली

आज ‘अपनी दुनिया’ का कलेवर बदलने के बाद सोचा क्‍यों न अब कुछ ‘निठल्‍ला चिन्‍तन’ ही कर लें। सबसे पहला सवाल उठा कि भैय्‍या विषय क्‍या चुना जाय, काफी सोचने के बाद ये निष्‍कर्ष निकला कि चलो आज ‘निठल्‍ला चिन्‍तन’ की उत्‍पति के बारे मे कुछ लिखा जाय।

पिछले साल की शुरूआत मे इस नाचीज को ‘ब्‍लोग’ के ‘ ब्‍ ‘ तक का कुछ इल्‍म न था। फिर इक दिन कुछ हुआ यों कि सर्फ करते करते रेडिफ डॉट कॉम के ‘ब्‍लोग’ बटन पे क्‍िलक कर लिया, बस फिर क्‍या था घर जाने से पहले अपने नाम का भी एक ब्‍लोग था इंटरनेट की इस मायावी दुनिया में, और अपने इस अंग्रेजी ब्‍लोग का नाम रखा गया ‘माय लोनली प्‍लेनेट’। साथ ही इस बात का भी एहसास हुआ कि भले ही इस दुनिया मे एक नाम के दो या दो से ज्‍यादा लोग हो जायें लेकिन इंटरनेट की इस मायावी दुनिया मे ये संभव नही। बरहाल थोड़ी सी कोशिशों के बाद हमै नाम मिल ही गया। ४-५ महीने इसी जगह ‘इधर उधर’ की हाँकते रहे, ‘मेरा पन्‍ना’ था सो जो जी मे आया ‘तत्‍काल’ कह दिया। ‘कुछ बतकही’ ‘ज्ञान विज्ञान’ की करी तो फिर कुछ किया ‘रोजनमचा’‘अपनी बात’ की ‘अभिव्‍यक्ति’ कभी ‘प्रंसग’ मे करी तो कभी ‘कविता सागर’ मे। कभी करी ‘नुक्ता चीनी’ और कभी ‘ठलुआ’ गिरी, जब कभी ‘कही अनकही’ छोड़ देने का मन किया तो बैठे रहे ‘फुरसतिया’ मे। ऐसा नही है कि हमेशा ही कुछ कहते रहे, कभी छुटि्यों मे कहीं ‘नौ दो ग्‍यारह’ हो गये तो अपने ब्‍लोग मे ‘निरवता’ भी छायी रहती। अगर कुछ नही किया तो वो था ‘चिट्ठा चर्चा’ और ना ही कभी करी ‘कुछ बाते मेरे जीवन’ की। ‘हाँ भाई’ तो अपनी ‘हृदयगाथा’ को यहीं ‘अल्‍पविराम’ देता हूँ, और जाता हूँ ‘निठल्‍ला चिन्‍तन’ की उत्‍पत्ति कि तरफ।

इसी बीच बन्‍दा अपना बोरिया बिस्‍तरा गर्म प्रदेश से समेट चला आया ठंडे प्रदेश मे, कहने का मतलब है फ्‍लोरिडा से मुँह उठा चले आये न्‍यूजर्सी। पोस्‍टल अड्रैस बदलने के बाद बारी आई वर्चुवल अड्रैस की, और जा पहुँचे ‘ब्‍लोगस्‍पॉट डॉट कॉम’। अंगुल करने की आदत शुरू से ही रही है तो एक दिन ‘ब्‍लोगर बार’ के ‘नेक्स‍ट बलोग बटन से छेड़कानी कर बैठे और नतीजा यह हुआ कि जा पहुँचे अतुल के ‘रोजनमचा’ मे। हिन्‍दी मे ब्‍लोग देख के अपनी तो आँखे ही खुली रह गयीं। इससे पहले की कुछ समझ पाते बॉस के कदमों की आहट सुनायी दी और अपना ब्राउजर बंद। फिर घर से ‘रोजनमचा’ की ढूँढ खोज शुरू की, इसको मिलना न था सो नही मिला। हम भी हथियार डालने वाले नही थे इसलिए जा पहुँचे संकटमोचक गुगलदेव की शरण मे। अगले ही पल रास्‍ता हमारे सामने था। आनन फानन हिन्‍दी ब्‍लोग शुरू करने की ठान ली, फिर बात वहीं नाम मे आके अटक गयी काफी सोच विचार के नाम रखा ‘निठल्‍ला चिन्‍तन’ और वेब अड्रैस शुरू किया ‘अपनी दुनिया’ के नाम से, तुरंत ही ‘टेस्‍ट चिट्ठा’ भी डाल दिया। और फिर एस वी और जीतू के आगमन के साथ ही लोगों का आना शुरू हो गया। एक दिन टाईप करने का रोना रोया तो रमण ने अगले ही दिन काफी सारे साधन बता दिये। इसी बीच पता चला पहली ब्‍लागजीन ‘निरन्‍तर’ का। अभी उसे पढना शुरू ही किया था कि जीतू भाई ने ‘ब्‍लागनॉद’ की घोषणा कर डाली। इस तरह हिन्‍दी ब्‍लॉगरस की दुनिया मे अपना भी सफर शुरू हो गया। बस यही थी ‘निठल्‍ला चिन्‍तन’ के उत्‍पत्ति की कहानी।

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6 Responses to “उत्‍पत्ति ‘निठल्‍ला चिन्‍तन’ की”

  1. Vijay Thakur Says:

    बहुत अच्छा लग रिया है नया कलेवर

  2. अतुल अरोरा Says:

    भइया कवर तो टनाटन है। आपको बुनो कहानी में प्रविष्टि मिली कि नही? नही तो जीतू और देबू को मेल लिख डालिए।

  3. Tarun Says:

    शुक्रिया भाई लोगों, अतुल प्रविष्टि तो नही मिली अभी, अब जीतू या देबू को मेल लिखूंगा…

  4. अरूंधती Says:

    बहुत अच्‍छे तरुण जी नि‍ठल्‍ला चिंतन की उत्‍पत्ति‍ बहुत दि‍लचस्‍प है. वि‍देश में रहते हुए भी आपकी हिंदी पर स्‍थानीय प्रभाव बहुत अच्‍छा है. अपने और अपने आसपास के बारे में कुछ और बताइए….

  5. श्रीश शर्मा 'ई-पंडित' Says:

    वाह रुचिकर। रविरतलामी जी ठीक कहते हैं अच्छी पोस्टें हमेशा पठनीय होती हैं। आज लगभग साल बाद भी ये पोस्ट पढ़ने में उतना ही आनंद आ रहा है जितना उस समय पढ़ने में आता।

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