मुंगेरी (एक कहानी) - ३
क्या करे क्या न करे मुगेरी की समझ नही आ रहा था, उसे यूँ बैठे हुए काफी देर हो गयी। अब तक रात का धुंधलका भी छाने लगा था। उसके पेट मे भूख से चूहे दौड़ने लगे, पास पर ही एक खाने का ठेली वाला नजर आया तो मुंगेरी उसी ओर चल दिया।
पेट पूजा करके उसे थोड़ी राहत मिली, अब उसके सामने समस्या थी रात गुजारने की। मुंगेरी ऐसे ही सड़क किनारे टहलने लगा, अपनी धुन मे चलते हुए वह काफी दूर निकल आया। सड़क पे सरपट दौड़ती गाड़ियों का शोर कम होने लगा लेकिन अभी भी ऐसा लगता था जैसे दिन का उजाला फैला हुआ हो। उसके गाँव में तो रात होते ही ऐसा अंधकार छा जाता जैसे मरघट, जैसे कोई रहता ही ना हो। उसे भी अब नींद अपने आगोश में लेने लगी और उसके पास सोने का ठिकाना न था। रहने के लिए कोई सस्ता सा होटल या धर्मशाला भी उसे आसपास नजर नही आ रही थी। वाह री किस्मत आकाश छूती इमारतों के होते हुए भी एक इंसान आशियाँ तलाश रहा था। तभी उसने देखा सामने ही फुटपाथ पर कुछ लोग सोये हुए थे। वो भी उस ओर चल दिया, थोड़ी देर मुंगेरी पास ही खड़ा सोचता रहा। लेकिन उस पे नींद इतनी हावी हो चली थी कि वह सारा संकोच छोड़, अपनी संदुकची से चादर निकाल वहीं पर लम्बा हो गया।
किसी की ठोकर से उसकी नींद खुल गयी, चादर हटाके देखा तो कोई पुलिस वाला था। “क्या है हवलदार साहेब”, मुंगेरी बोला। “शहर में नये आये हो बरखुदार” हवलदार बोला। मुंगेरी सोच मे पड़ गया कि इसको कैसे मालूम, “क्यों बे सुनायी नही दिया, क्या पूछा” हवलदार की कर्कश आवाज उसके कानों में पड़ी। मुंगेरी के हाँ में जवाब देते ही पुलिसिया बोला, “यहाँ क्या बाप की जागीर समझ के सो रहा है”। “क्यों साहेब बाकी लोग भी तो सोये हैं” मुंगेरी हिम्मत करके बोला। “पाँव पालने में पड़े नही और हमसे कुश्ती” हवलदार थोड़ा उखड़ने लगा था। हवलदार बेशरमी से बोला, “ये तो इनके बाप की जगह है यहाँ सोयें या मूते इनकी मर्जी”। उसकी बात सुन मुंगेरी बगले झाँकने लगा, “अबे ये उल्लू की तरह क्या देख रहा है, चल उठ और यहाँ से दफा हो जा”। मुंगेरी किसी तरह हिम्मत करके फिर बोला, “साहेब, बस आज रात सोने दो। कल सुबह होते ही चला जाऊंगा”। अंधा क्या चाहे दो आँखे, यह सुनते ही हवलदार बोला “ठीक है आज सोजा लेकिन टैक्स पड़ेगा”। “टैक्स! वो क्या” मुंगेरी ने पूछा। “जैसे हाऊस टैक्स, इन्कम टैक्स वैसे ही फुटपाथ टैक्स” जवाब मिला। “चल जल्दी से बीस का पत्ता निकाल और पड़ा रह आराम से यहाँ” हवलदार फिर बोला। मुंगेरी ने बीस का एक नोट निकाल आगे बड़ा दिया।
उन दोनो की बातचीत से मुंगेरी के पड़ोस मे सोया आदमी जग चुका था। वो मुंगेरी से बोला “क्या बात हो गई भाई”? मुंगेरी ने शुरू से लेकर अब तक की अपनी राम कहानी सुना दी। सब सुन कर वो बोला, “मेरी मानो तो सुबह होते ही वापसी की गाड़ी पकड़ लो, अभी भी कुछ नही बिगड़ा”। मुंगेरी ने उसकी बात अनसुनी कर पूछा, “भैय्या एक बात बताओ, वो पुलिस वाले ने तुम से टैक्स क्यों नही लिया”। आदमी बोला “हम हैं भिखारी, दिन भर भीख माँगते हैं रात को यहाँ आकर सो जाते हैं, रहा सवाल टैक्स का तो उसका अपना महीने का बंधा हुआ है। सोने के लिए मिली २ गज जमीन का किराया समझो या चाहे कुछ, हर महीने देना ही पड़ता है। अब इस शहर मे रहोगे तो धीरे-धीरे सब समझ जाओगे। बाबू ये शहर है यहाँ का हर इलाका बंटा हुआ है - पुलिस में, भिखारियों में, चोरों में”, “पुलिस में भी!” मुंगेरी भिखारी कि बात काट के बोला। “कुछ गिनती के वर्दी वालों को छोड़कर”, भिखारी ने जवाब दिया। “तभी कह रहा हूँ लौट जाओ यहाँ जिन्दगी इतनी आसान नही है।” मुगेरी को चुप देख उसको लग गया ये अभी तो लौटने वाला नही दिखता इसलिए बोला, “देखो भैय्या अपने को तो भीख मांगने की आदत सी पड़ गयी है इसलिए हम तो कोई काम करने से रहे लेकिन अगर तुम चाहो तो तुम्हे कल एक आदमी से मिलवा सकता हूँ शायद वो कुछ कर दे तुम्हारे लिए”। मुंगेरी सोच रहा था कि इस भिखारी की बात का विश्वास करे कि नही, भिखारी की बात भला कोई क्यों मानेगा, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा काफी इसलिए बोला, “तुम्हारा ये एहसान कभी नही भूलूँगा”। “एहसान भूल भी जाओ तो चलेगा लेकिन कल अगर कुछ कमाने लग जाओ तो इस भिखारी को भीख देना मत भूलना। इसी से अपनी रोजी रोटी चलती है, किसी के एहसान से अपना पेट भरने वाला नही”, भिखारी ने जवाब दिया।
……………………………………………………………………………………. क्रमशः












This post has 1 comments
May 17th, 2005
कहानी में मजा आ रहा है.अगले अंक का इंतजार है.
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