एक पाती प्रीटी वूमेन के नाम

10 वीं अनुगूँज का विषय रखा गया - “एक पाती ‘…’ के नाम”। अब पाती लिखे तो हमें जमाना बीत गया, ऊपर से समस्‍या थी कि पाती लिखे तो किस के नाम, और किस विषय को ले कर। याद आया कि विषय को लेकर थोड़ी छूट मिली हुई है पाती के लिए यूँ ही गप-सड़ाका भी लिख सकते हैं। फिर याद आया कि कभी ‘इ-चर्चा’ की वर्षगांठ पर सभी सदस्‍यों के नाम मिलाकर कर एक पाती लिखी थी, सोचा क्‍यों न उसी को यहाँ लिख दिया जाय। तो इस अनुगूँज के लिए पेश है- ‘एक पाती प्रीटी वूमेन के नाम’।

ओ मेरी प्‍यारी ‘प्रीटी वूमेन’,
तुम मेरी जिन्‍दगी की ‘सुपर गर्ल’ हो, तुम्‍हारी वो प्‍यारी-प्‍यारी ‘स्‍मेलीफिंगर’, वो खुबसूरत ‘नेत्र’। जब भी तुमको सोचता हूँ, मेरा ‘शीना’ (सीना पढ़े) जोरों से धड़कने लगता है। मै वाकई मे तुम्‍हारा ‘ब्‍वायफ्रैंड’ बनना चाहता हूँ। मै समझ सकता हूँ, तुम सोच रही होगी कि आखीर मै हूँ कौन। इसलिए थोड़ा मै तुम्‍हे अपने बारे मे भी बता दूँ।

मै हूँ ‘प्राउड हिंदुस्‍तानी’, एक सच्‍चा ‘देशप्रेमी’ मूलतः एक ‘इंडियन सीटीजन’। Anugoonjaजब मै अमेरीका आ रहा था तो मै ‘स्‍मार्टगांडू इन यूके’ से मिला और उसी ने मुझे तुम्‍हारे बारे मे बताया। तब से तुम्‍हे ढूंढने के लिए मैने क्‍या-क्‍या ना किया, मै ‘तांत्रिक योगी’ के पास गया, मैने ‘देशीबाबा’ से तुझे ढूंढने को जादू-मंतर पूछा लेकिन कुछ भी फायदा नही हुआ। फिर एक दिन तू मुझे एक पल के लिए ‘इ-चर्चा’ मे दिखी तो मेने ये इ-पत्र लिखना शुरू किया।

जब मै इंडिया मे था तो मै एक ‘शिव सैनिक’ था, और मेरा काम हर एक ‘दलित’ को अपनी पार्टी मे शामिल करना था। लेकिन मै तुम्‍हे बताऊं संभवत शायद मै एक ‘आर्यपुत्र’ था इसलिए मुझे ये ‘डर्टी’ पालिटिक्‍स पसंद नही आयी। उस वक्‍त कालेज से निकले ही थे इसलिए कुछ जवानी का जोश भी था, मै अपने को बड़ा ‘जांबाज’ समझता था। जेम्‍स बांड की मूवी देख देख के अपने को किसी ‘धुरंधर’ से कम नही समझता था। इसलिए पालिटिक्‍स को लात मार मै भी ‘लाल लंगोट’ बांध अमेरिका आ गया।

तुम सोच रही होगी कि मै भी कितना बड़ा ‘कमीना’ हूँ, ना जान ना पहचान और तेरे गले पड़ रहा हूँ, लेकिन ऐसा नही है मै तो यहाँ साफ्‍टवेयर की दुनिया का ‘शहंशाह’ बन ने आया हूँ। मै कोई ‘घसयारा’ नही जो ‘शहंशाह’ ना बन सकूँ। हाँ तो मै तुम से यहाँ आने की ‘इ-चर्चा’ कर रहा था। एयरपोर्ट मे उतरते ही मुझे ‘मद्रासी बाबू’, ‘बाबू हैदराबादी’ टाईप की फीलिंग वाले लोग दिखने लगे। मेरे ‘नेत्र’ किसी नार्थ के बन्‍दे की तलाश मे थे, तभी अचानक मुझे एहसास हुआ कि मेने किसी को टक्‍कर मार दी है। मेने देखा तो वह ‘द रॉक’ के साथ एक गहरी टक्‍कर थी। तभी मुझे २-३ नार्थ टाईप बन्‍दे दिखे तो मेने उन्‍हे हॉय हैलो किया और उन्‍होने मुझे अपना नाम ‘बिग-जी’, ‘जी-पेल’ और ‘वाइकिंग’ बताया। इन अजीब नामों को सुन के मुझे वाकई लगने लगा कि मै अमेरिका पहुँच गया हूँ।

कम्‍पनी के गेस्‍ट हाऊस पहुँच कर मै सबसे पहले नहाने गया और घंटो नहाता रहा क्‍योंकि कोई ये कहने वाला नही था कि ‘राहुल’ जल्‍दी करो पानी चला जायगा। एयरपोर्ट मे ‘द रॉक’ के साथ हुई गहरी टक्‍कर से मेरे बदन मे दर्द हो रहा था इसलिए मेने अपने साथ लायी ‘झंडु’ बाम की शीशी निकाली और अपने शरीर मे थोड़ी मल ली उसे लगाने से थोड़ा आराम मिला। अगले दिन सुबह-सुबह मेने ‘राइजिंग सन’ देखा वो बहुत सुंदर द्रश्‍य लग रहा था, मुझे थोड़ी देर के लिए ‘नंदिनी’ की याद आ गयी, ‘नंदिनी’ मेरी पूर्व प्रेमिका, उसे सन राइज देखना बहुत पंसद था।

उसके बाद जब मै घुमने निकला तो यहाँ के बड़े-बड़े हाइवे देख के मेरी ‘खोपड़ी’ घूम गयी। फिर उस रात ‘मैन ऑफ लामंचा’ नाम के एक रेस्‍ट्राँ मे मैने डिनर किया।कहते हैं कि वो पहले किसी ‘आरेंगजेब’ का था, जिसे अपने भाई के साथ धोखा करने के जुर्म मे पुलिस पकड़ के ले गयी थी। आजकल उसे कोई ‘खान बाबा’ चलाते हैं। रेस्‍ट्राँ से बहुत ज्‍यादा ‘किंगफिशर’ पी कर मे गेस्‍ट हाउस वापस पहुँचा, वहाँ के सूनेपन से मुझे बहुत ‘होमसिक’ टाईप फीलिंग आयी, ‘करूणा’ भरे चेहरे याद आने लगे।

यहाँ एक बात मेरी समझ मे नही आयी कि हम सब लोग तो यहाँ ‘विदेशी’ हैं फिर क्‍यों एक दूसरे को देशी कहते हैं। ऐसे ही दिन गुजरने लगे। एक दिन फिर मै न्‍यूयार्क गया, इंडिया मे अपने शहर मे छोटी-छोटी गलियां हुआ करती थीं यहाँ ‘बिग-ग’लियां थीं। टाईम स्‍कवायर मे रात के वक्‍त ऐसा लगा जैसे सैकड़ों ‘चिराग २०००’ वोल्‍ट के जल रहे हों। वक्‍त गुजरने के साथ-साथ मेरा स्‍टेटस भी एन आर आइ का हो गया लेकिन मै अपने को ‘इ-एनआरआइ’ कहलाना पंसद करता था। एन आर आइ होते ही मै अमेरिका की बड़ी-बड़ी बातें करने लगा और इंडिया मुझे एक बेकार सा देश लगने लगा।

मै भी अपने पड़ोसी ‘फ्रेंक ऐलन’ की बहिन ‘केट’ के साथ नैन मटक्‍के करने लगा, लेकिन उन्‍ही दिनों ऐसा जोर का ‘पर्फेक्‍ट स्‍टार्म’ आया कि जगह-जगह से मेरे जैसे कंसलटेंट बेंच मे आने लगे, जगह-जगह लेऑफ होने लगे। मुझे फिर से ‘लालू प्रसाद यादव’ और ‘राबड़ी देवी’ वाला देश याद आने लगा। एक दिन फिर मुझे ‘बड़ा भाई’ मिला, मैने जब उसे सब बताया तो उसने ही कहा कि इस से पहले कि तेरी ‘प्रीटी वूमेन’ कहीं रन-वे ब्राइड ना हो जाय उसको पाती (लैटर) लिख डाल और मै पाती लिखने बैठ गया।

यही है मेरी कहानी, अब ज्‍यादा ‘दीसएनदैट’ ना करते हुए मै इतना ही कहूँगा कि मुझे आशा है, मेरी कहानी सुन के तू मेरी दोस्‍ती का पैगाम अपना लेगी और मै भी दुनिया से ‘सीना’ फुला के कह सकूंगा कि वो ‘स्‍मेलीफिंगर’ वाली, वो ‘मनोहर’ चेहरे वाली, वो बड़े-बड़े ‘नेत्र’ वाली ‘प्रीटी वूमेन’ मेरी ‘सुपर गर्ल’ है।

तुम्‍हारा ही ‘प्रोफेसर पगला कहीं का’
‘आवारा दोस्‍त’

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Tarun
निठल्ला चिन्तन एक आक्रौश है विचारों की आंधी का, एक द्वंद है सच और झूठ का, एक भावना है प्यार की, एक तमन्ना है आकाश छूने की, कुछ कहने की और कुछ अनकही छोड़ देने की; संक्षेप में कहूँ तो ये है थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन।

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