मुंगेरी (एक कहानी)

इन से मिलये, ये हैं मुंगेरी, वैसे तो इनका नाम बजरंगी है, लेकिन जब से ये सोते जागते सपने देखने लगे गांव वालो ने इनका नाम मुंगेरी रख दिया॥ बाप का क्या नाम है यह तो नही मालूम लेकिन गांव में सब उन्हें र्मिची सेठ कहके पुकारते हैं, सुना है ये पहले र्मिची बेचने का काम किया करते थे इसलिए इनका ये नाम पड़ गया॥ हाँ तो हम बात कर रहे थे मुंगेरी की, इनकी कथा आगे बडा़ने से पहले इनकी थोडी़ और तारीफ कर दी जाय॥

छोटा कद “मुंगेरी लाल के हसीन सपने” के रघुवीर यादव सा,छोटे से चेहरे में “मंगल पांडे” के आमीर जैसी मुँछे, खोपडी़ “पडो़सन” के महमूद जैसी और पहनावा वही धोती वही कुर्ता ॥ मुशकिल से आठवीं पास, लेकिन टीवी देखते-देखते ख्वाब बडे़-बडे़, बिल्कुल मौसम की तरह इनके सपने भी बदलते रहते, आजकल नेता बनने का शौक चढा़ हुआ है॥ शौक चाहे जैसा भी हो, सपने चाहे जो भी हों पर अपना मुंगेरी दिल से बहुत ही अच्‍छा और दिमाग से थोड़ा सुलझा हुआ इन्‍सान है॥

गाँव मे सभी जानते थे इसलिए यहाँ रह के यह काम तो होने ला नही था, आजकल इसी उधेड़ बुन मे थे कि ऎसा क्या किया जाय की जल्दी से नेता बन जांये॥ जब बडे़ बुढो़ ने समझाने कोशिश की कि भैय्या पहले थोडा़ पढ़ लो र्गेजवेसन (graduation) कर लो तो झट से जवाब दिया लालू किये थे क्या र्गेजवेसन, बस एक बार नेता बनने दो यूनिवर्सिटी वाले घर से बुला के डिगरी दे जायेंगे॥ बात मे दम था एसा होते हुए तो देखा ही था सो हो गये सब चुप॥ करते क्या बढे़ बुजुर्ग सब अगले मौसम का इंतजार करने लगे॥ कभी तो मौसम बदलेगा और नेता बनने का भूत खोपडी़ से उतरेगा॥

लेकिन कुछ बात बनते नही देख अपने मुंगेरी की बैचेनी बढ़ती जा रही थी॥ एक दिन किसी चाहने वाले ने कान मे बात डाल दी कि नेता बनना है तो दिल्ली चले जाओ, मुम्बई मे तो काम बनेगा नही॥ “वो भला क्यों” मुंगेरी ने पुछा, वो इसलिए की सीधे तो कोई नेता बनने का टीकीट देगा नही, हीरो बनने लायक तुम हो नही कि एक बार हीरो बन गये फिर राजनीतिक पार्टी वाले घर आके पैर पकड़ के बोलेंगे भैय्या हमारी पार्टी कब ज्वाइन कर रहे हैं॥ इसलिए एक ही रास्ता है की दिल्ली चले जाओ और किसी तरह “सॉस बहू___” वाली छोरी के किसी सीरियल मे कोई काम ले लो॥ चल भाग, मुंगेरी ने झीटक दिया, कला और राजनीति का कोई साथ है भला॥ तो ठीक है भैय्या यहीं गाँव में पडे़ रहो, दूसरे ने ताना मारा॥ मुंगेरी हाथ से बात निकलती देख बोले लेकिन हम एक्टिंग कैसे करेंगे हमे तो कुछ आता नही॥ पहले वाले ने याद दिलाया, अरे भैय्या पार साल गाँव की रामलीला मे राम की सेना मे बंदर बने थे कि नही, बस वैसे ही तो करते हैं एक्टिंग॥ मुंगेरी को बात जंच गयी और उसने अगले ही दिन दिल्ली जाने की ठान ली॥ अगले दिन सुबह अंधेरे मे बाप की अंठी से कुछ रूपया-पैसा चुरा और थोडा़ सामान ले मुंगेरी ने पकड़ ली दिल्ली जाने वाली र्टैन (Train)॥ चाहने वालों ने पहले ही गाँव के किसी आदमी का पता दे दिया था जो दिल्ली मे कहीं रहता था॥

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Tarun
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4 Responses to “ मुंगेरी (एक कहानी) ”

  1. [...] मुंगेरी (एक कहानी) - २ April 23, 2005 [Tags:कथा कहानी] गतांक से आगे….. [...]

  2. [...] दम तोडती कहानियाँ February 10, 2007 [Tags:बस यूँ ही, indian tv serials, sony, star plus, zee] जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढा है - कहानियाँ भी दम तोडती हैं। लेकिन यहाँ मैं अपनी उस कहानी की बात नही कर रहा हूँ जो शुरू तो जोरशोर से की थी लेकिन जिसके अंत का अभी पता नही क्योंकि उसका तयशुदा अंत लापता है, मिल नही रहा। और ना ही बुनो कहानी की उन कहानियों की बात कर रहा हूँ जो अपने पूर्ण होने की बाट जोह रही है, अब भी सोच रही हैं शायद कोई कहानीकार आये और उन्हें पूर्णता की प्राप्ति हो। [...]

  3. [...] गतांक से आगे….. [...]

  4. [...] मुंगेरी - भाग १, भाग २, भाग ३ [...]

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