एक परेशान दिल से निकली आह की कराह जानकर बतायें आप किस जमात में शामिल है, सताये हुए की या सताने वाले की। आजकल जिंदगी बहुत व्यस्त चल रही है, कई कई दिनों तक ब्लोगिंग में उपयोग लायी ई-मेल चैक नही हो पाती और आज जब थोड़ा फुरसत में चैक की तो देखकर दिल से यही निकला -
एक टिप्पणी गलत पड़ी थी कुछ नये हिंदी ब्लोगस में
उनकी पोस्ट के लिंक फिर ईमेल में स्पैम की तरह आते रहे
फिलहाल तो बिना पढ़ी ईमेल का आंकड़ा १०० की संख्या छू रहा है पार कर गया है, आपके सामने रोना जरूर रो रहे हैं लेकिन अपने ईन-बॉक्स की इस हालात के हम खुद जिम्मेदार हैं। कालांतर में जब नये हिंदी ब्लोग आ रहे थे और हम फुरसत में हुआ करते थे तो
प्रोत्साहन की गरज से उनके ब्लोग में टिप्पणियाँ कर आते थे। ये अलग बात है कि उनमें से ज्यादातर ने निठल्ले के चिंतन को जानने की कोई जरूरत नही समझी और बदले में टिप्पणी ना मिलने पर हम ये समझाते रहे चलो अच्छा हुआ डाटॉबेस में कुछ तो जगह बची। तब नही सोचा था कि हमारी भलमनसाहत हमारी ही ईमेल के ईनबॉक्स को ले डूबेगी।
सबसे पहले जिसने पीठ में लात मारी उसने अपनी किसी पोस्ट का लिंक हमारे ईमेल को इस तरह से यूज करके भेजा जैसे किसी न्यूड बीच में लोग घूमा करते हैं यानि कि सौ और लोगों को हमारा ईमेल एड्रैस मिल गया। उसके बाद धीरे धीरे कुछ इस तरह से ईमेल आने लगी - “एक विशेष नयी पोस्ट कल सुबह के लिये लगा के रखी है, जरूर आइये” और उसके अगले दिन ईमेल आती है “वो विशेष पोस्ट जो कल लगा के रखी थी पब्लिश हो गयी है और आपकी बाट जोह रही है“। जहाँ कुछ लोग सीधे लिंक थमा के भेज देते हैं वहीं कुछ थोड़ा सजा के यानि टेक्सट को हाइपर लिंक लगा के जैसे टेक्सट होगा “छप्पन छुरी की तिरछी नजर” और उस पर लिंक लगा होगा।
अब तो कई ऐसे लोग भी अपनी नयी पोस्ट के लिंक भेजने लगे हैं जिनका नाम भी पहली बार सुन रहे हैं। लिंक देखकर दिल से यही निकल रहा है, आप भी क्यों हिंदी ब्लोगर हो गये? यही नही कुछ लोग तो खुद का ही ब्लोग फोलो करके फिर उस ब्लोग को फोलो करने के लिये भी लिंक भेजने लगे हैं, उस लिंक पर क्लिक किया नही कि आपकी तस्वीर उनके यहाँ दिवार पर शोभा बढ़ाने लगेगी।
हमारी ईमेल का नाम तो पड़ोस के घर से भागे किसी नवयुवक के नाम जैसा बदनाम हो गया है, ना जाने कहाँ कहाँ किस किस की जुबाँ पर चढ़ गया है। सिर्फ ब्लोग ही नही कभी कुछ आता है तो कभी कुछ, अभी कुछ देर पहले ही एक ईमेल आयी जिसके सब्जेक्ट में लिखा है - कैटरीना मस्ट गैट इनटू बिकनी। अब बिकनी में घूमे या बिनाकनी के, कोई हमारे तुम्हारे सामने तो टहल नही रही है जो मेल लिखकर खाना खराब कर रहे हो। शुरू शुरू में ऐसी ईमेल के लिये फिल्टर लगा देते थे अब लगता है अगर ऐसे ही लगाते रहे तो हमारा ईनबॉक्स फिल्टरबॉक्स बन जायेगा।
और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सब लोग कभी हमारी गली आकर झांकते नही, ऐसा ही चलता रहा तो कहीं हालात इस कदर ना बिगड़ जायें कि हमें हिंदी ब्लोगस की दुनिया को कहना पड़े -
तेरी दुनिया से हो के मजबूर चला,
मैं बहुत दूर, बहुत दूर, बहुत दूर चला।
इस कदर दूर कि फिर लौट के भी आ ना सकूँ,
अपने नये ईमेल का पता किसी को भी बता ना सकूँ
और ब्लोगिंग होती है क्या जिंदगी में कभी दोहरा ना सकूँ,
तेरी दुनिया से….
अच्छा तो हालात के सताये इस ब्लोगर की कराह सुनकर आप भी अपना हाले दिल बताते चलें -
क्या आप भी इस कदर सताये हुए हैं?
या किसी को इस कदर सता कर इसे पढ़ने यहाँ आये हुए हैं।











