< Browse > Home /

| Mobile | RSS

एक प्यारा सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव

बहुत सालों पहले की बात है जब मैं छोटा था, जब सिर्फ दूरदर्शन होता था, जब टीवी प्रोग्राम सिर्फ कुछ घंटों के लिये आते थे। तब दो प्रोग्रामों के बीच में फिलर की तरह अलग अलग गायकों के गैर फिल्मी गीत और गजल बजते थे। उन्हीं में से एक थी राजेन्द्र मेहता और नीना मेहता [...]

[ More ] October 29th, 2009 | 4 Comments | Posted in Gazals |

चंदन दास की आवाज में सुनियेः मैंने मुँह को कफन में छुपा जब लिया

आप में से अगर किसी को दूरदर्शन के जमाने की याद हो तो ये भी याद होगा कि उसमें अक्सर गाहे-बगाहे एक शख्स की महफिल जमती थी या कह लीजिये उसके गीत और गजल बजते थे। जी हाँ, सही पहचाना मैं चंदन दास की बात कर रहा हूँ। गीतों के अंदाज में गायी उनकी गजलें [...]

[ More ] March 23rd, 2009 | 7 Comments | Posted in Gazals |

मिर्जा गालिब १: हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे

अगली कुछ पोस्टों की श्रृंखला में बात करेंगे मिर्जा गालिब की, उनकी लिखी कुछ गजलों की, और सुनेंगे कुछ गजलें। मिर्जा गालिब के ऊपर वैसे तो पहले ही बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है लेकिन फिर भी अपनी तरफ से उन पर लिखने की कुछ गुस्ताखी तो हम भी कर ही सकते हैं। [...]

[ More ] February 28th, 2009 | 4 Comments | Posted in Gazals, Mirza Ghalib |

दो जवां दिलों का ग़म दूरियां समझती हैं

इस बार की मेरी पसंद है अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की गायी ये गजल जिसे हमने गीत पहली -१ में पहचानने को पूछा था। इसका सही जवाब दिया कबाड़खाने के कबाड़ी अशोक पांडे जी ने। अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन की गजलों में मुझे जो सबसे ज्यादा पसंद आता है वो है इन दोनों [...]

[ More ] October 21st, 2008 | 3 Comments | Posted in Gazals |