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आँखों पर एक चर्चा: आँखों पर लिखे कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मी गीत – भाग १

July 23rd, 2010 | 3 Comments | Posted in Ek Shabd Sau Afsaane

मैंने पिछले एक पोल में पूछा था कि शरीर के किस अंग की तारीफ में लिखे गीत ज्यादा पसंद हैं और उसमें नंबर एक पसंद थी “आँखें (Eyes)“। आज से आगे की कुछ पोस्ट तक उन गीतों की बात करेंगे जो आँखों के ऊपर लिखे गये हैं या जिन गीतों में आँखों का जिक्र आता है। मैंने एक बात और नोट की है कि किसी भी गीत की सफलता में सबसे कम श्रेय मिलता है उस गीत को लिखने वाले को यानि कि गीतकार को। इसलिये गीत के साथ सिर्फ गीतकार के नाम का ही जिक्र करेंगे।

गीत लिखने में कवियों और गीतकारों ने आँखें शब्द के अलावा इसके पर्यायवाची शब्दों नैन, नयन, निगाहें, अंखियाँ जैसे शब्दों का भी खूब इस्तेमाल किया है और करते आ रहे हैं। मैं आँखों के ऊपर लिखे और मेरे सुने गये गीतों की लिस्ट बनाने बैठा तो काफी लंबी लिस्ट बन गयी और इन सबको एक ही पोस्ट में समेटना संभव नही इसलिये चर्चा २-३ किस्त तक करेंगे।

आँखों के ऊपर “आँखें” नाम से अभी तक जो मुझे पता है, तीन फिल्में बन चुकी हैं, २००२ (विपुल शाह निर्देशित अमिताभ बच्चन के साथ), १९९३(डेविड धवन निर्देशित गोविंदा के साथ) और १९६८ (रामानंद सागर निर्देशित धर्मेन्द्र के साथ)।

सबसे पहले उन आँखों का जिक्र करते हैं जो शांत हैं, चौकस हैं और जरूरत पड़ने पर अंगारे भी बरसाती हैं। अगर अभी तक आप अंदाज नही लगा पायें हैं तो मैं सीमा पर पहरा देती बहादुर फौजियों की आँखों का जिक्र कर रहा हूँ और इन आँखों पर साहिर लुधयानवी ने क्या खूब लिखा है – उस मुल्क की सरहद को कोई छू नही सकता जिस मुल्क की सरहद की निगेहबाँ हैं आँखें…….शबनम कभी शोला कभी तूफान हैं आँखें

अक्सर प्रेमी युगल आँखों का उपयोग बातें करने में भी करते हैं शायद ऐसे ही किसी जोड़े को देख जान निसार अख्तर ने लिखा “आँखों ही आँखों में इशारा हो गया“। बात इशारों तक ही सीमित नही रहती कुछ प्रेमी इन आँखों को शो-केस की तरह इस्तेमाल भी करते हैं, और गुलजार ने इसे कुछ यूँ बयाँ किया “आँखों में हमने आपके सपने सजाये हैं“, और “आपकी आँखों में कुछ महके हुए से ख्वाब हैं“।

आँखों में सपने और ख्वाब के अलावा भी बहुत कुछ देखा जा सकता है मसलन एस एच बिहारी (फिल्म किस्मत में नूर देवासी ने भी गीत लिखे थे) कहते हैं, “आँखों में कयामत के काजल” जबकि राजेन्द्र कृष्ण का मानना है, “आँखों में मस्ती शराब की” लेकिन इतना सब सुनकर भी मजरूह (सुल्तानपुरी) साहेब मासूमियत से पूछते हैं, “आँखों में क्या जी?” एक तरफ शराब की मस्ती की बात करने वाले राजेन्द्र कृष्ण ठुकराये जाने का दर्द कुछ इस तरह बयाँ करते हैं, “आँसू समझ के क्यों मुझे आँख से तुमने गिरा दिया, मोती किसी के प्यार का मिट्टी में क्यों मिला दिया“।

प्रेम धवन भी आँखों की तारीफ में पीछे नही रहते और कह उठते हैं, “बहुत हसीँ है तुम्हारी आँखें, कहो तो मैं इनसे प्यार कर लूँ” जबकि साहिर लुधयानवी साहेब का कुछ ये कहना है, “भूल सकता है भला कौन प्यारी आँखें, रंग में डूबी हुई नींद से भारी आँखें“। लेकिन राजेन्द्र कृष्ण के ख्यालात अपने साथियों से बिल्कुल जुदा है, ये एक तरफ कहते हैं “आँखें हमारी हों सपने तुम्हारे हों” और फिर इशारे में बात करने लगते हैं “तेरी आँख का जो इशारा ना होता, तो बिस्मिल कभी दिल हमारा ना होता“।

कैफी आजमी साहब जहाँ सवालिया मूड में सवाल करते हैं, “जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें, राख के ढेर में शोला है ना चिंगारी है” वहीं दिल्ली के तख्त में बैठने वाले आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर अपनी जिंदगी के दुख को यूँ बयाँ करते हैं, “ना किसी की आँख का नूर हूँ, ना किसी के दिल का करार हूँ, जो किसी के काम ना आ सके मैं वो एक मुस्त-ए-गुबार हूँ“।

साहिर लुधयानवी से बादशाह का दुख नही देखा गया और कलम उठा के उनको पाती में लिख भेजा, “पोंछ कर अश्क अपनी आँखों से मुस्कुराओ तो कोई बात बने, सर झुकाने से कुछ नही होगा, सर उठाओ तो कोई बात बने“।

और इस पोस्ट के अंत में एक बार फिर गुलजार साहब का आँखों पर लिखा कुछ इस तरह है , “मचल के जब भी आँखों से छलक जाते हैं दो आँसू, सूना है आबसारों को बड़ी तकलीफ होती है“।

लेकिन आँखों पर लिखे पहले भाग में आनंद बख्शी का आँखों पर कही बात कैसे छोड़ सकते हैं भला,-

कितने दिन आँखें तरसेंगी, कितने दिन यूँ दिल तरसेंगे,

एक दिन तो बादल बरसेंगे, ऐ मेरे प्यासे दिल।

आज नही तो कल महकेगी ख्वाबों की महफिल।

इस अंक में जिक्र गीतों की झलक:

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पुनश्चः इस अंक में सुनाये गीतों को सुनकर पता चला कि गुलजार का लिखा, “हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू“, हसरत जयपुरी का लिखा, “छलके तेरी आँखों से शराब और ज्यादा” और मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा “जलते हैं जिसके लिये, तेरी आँखों के दिये” का जिक्र करना रह गया था।

आँखों और उन पर लिखे गीतों का जिक्र अगले भाग में जारी रहेगा, हो सकता है इस श्रृंखला से आपको कई नये गीतों का पता चला हो, जरूर बताईयेगा आपको ये प्रयास कैसा लगा। अगर किसी गीत के गीतकार का उल्लेख गलत हुआ हो तो सही गीतकार का नाम बताना ना भूलें। वैसे आपको अब तक जिक्र किये गीतों में कौन सा सबसे ज्यादा पसंद आया?

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3 Responses to “आँखों पर एक चर्चा: आँखों पर लिखे कुछ बेहतरीन हिंदी फिल्मी गीत – भाग १”

  1. अनूप शुक्ल Says:

    बहुत सुन्दर प्रयास है। फ़िर से निठल्लों को सक्रिय होता देखकर बहुत अच्छा लगा। आंखों पर मुझे एक गीत बहुत याद आता है- नैन लड़ जैंहे तो मनवा मां कसक हुइबै करी। इसके बारे में अगली पोस्ट में इंतजार है। :)

  2. संजय भास्कर Says:

    बहुत सुन्दर प्रयास है

  3. maya bhatt Says:

    ye aankhe-ooph yoo maa !!!!!!!!!!

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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