मैली चादर ओढ़ के कैसे
बचपन में जब हम सोते से उठते थे तो बड़े ही मीठे मीठे भजन सुनायी पड़ते थे, उनमें से एक था मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ। हालाँकि उम्र के उस पड़ाव में भजनों से उतना अटेचमेंट नही होता जितना उम्र के आखिरी दौर में लेकिन फिर भी कुछ भजन ऐसे थे जो गीत के बोलों और गाने वाले की आवाज से ज्यादा आकर्षित करते थे। ऐसे ही गाने वाले थे श्री हरि ओम शरण जिनके गाये सभी भजनों में बहुत मिठास थी।
तब उस वक्त भजन, भगवान और इस तरह के बातों की इतनी मार्केटिंग नही थी कुछ गीने चुने भजन रिकार्ड होते थे कुछ इक्के-दुक्के गायकों द्वारा। अब तो जैसे भजनों के बाढ़ आ गयी है लेकिन फिर भी उन भजनों में वो भावना नही मिलती। कई भजन तो संगीत के हिसाब से किसी फिल्मी गाने का एक्सटेंशन से लगते हैं।
आज जब हरि ओम शरण को सुन रहा था तो मैली चादर की याद आ गयी, और सुनकर आनंद आ गया। मुझे मालूम नही है ये लिखा किसने है लेकिन बहुत खूब लिखा है।
मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तुम्हारे आऊँ
हे पावन परमेश्वर मेरे मन ही मन शर्माऊँ
तूने मूझको जग में भेजा निर्मल देकर काया
आकर संसार में मैंने इसको दाग लगाया
जनम जनम की मैली चादर कैसे दाग छुड़ाऊँ
चादर को मन का सिंबल बताकर उसके अंदर भरे मैल की बात कितनी बढ़िया तरके से कही है इस भजन को सुनकर आपको पता चल जायेगा, शायद इसीलिये कहा गया है ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’।
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जब भी भजन सुनने का मन होता है तो इसे जरूर सुनती हूमं। हरिओम शरण मेरे मनपसंद गायक हैं।धन्यवाद।