एक प्यारा सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव
बहुत सालों पहले की बात है जब मैं छोटा था, जब सिर्फ दूरदर्शन होता था, जब टीवी प्रोग्राम सिर्फ कुछ घंटों के लिये आते थे। तब दो प्रोग्रामों के बीच में फिलर की तरह अलग अलग गायकों के गैर फिल्मी गीत और गजल बजते थे। उन्हीं में से एक थी राजेन्द्र मेहता और नीना मेहता की गायी ये गजल - एक प्यारा सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव। ये तब भी अच्छी लगती थी और अब और भी ज्यादा अच्छी लगती है।
महानगरों में रहने वाले तो शायद ही इस गजल से कुछ रिलेट कर पायें लेकिन जो छोटे शहरों में या गाँवों में पहले रहे हों उनको शायद कुछ पुराने दिन याद आ जायें। यही नही अब तो उन छोटे शहरों में रहने वाले भी बजाय इस गीत के शायद जगजीत सिंह की इस गजल को गुनगुनाना ज्यादा पसंद करेंगे, “हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी।
खैर ये जाने दें और आप सुनिये -
एक प्यारा सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव,
छोड़ कर गाँव को उस घनी छाँव को,
शहर के हो गये हैं, भीड़ में खो गये हैं।













गाँव …पीपल सब याद आ गए …!!