शर्मा बंधुओं को सुनियेः जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को
जब मैं छोटा था तब दूरदर्शन में अक्सर एक भजन बजता (सुनता) हुआ दिखायी देता, भजन की कुछ समझ ना होने के बावजूद भी वो सुनने में बहुत मधुर लगता था। आज अचानक फिर से सुना तो मन को वैसा ही सुकून मिला जैसे तपती दोपहरी में छावँ में खड़े होने पर या पानी की बूँदों को चेहरे पर मारने पर मिलता है।
इस प्रसिद्ध भजन को गाया है शर्मा बंधुओं ने और भजन है -
जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाये तरूवर की छाया - २
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है, मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम
भटका हुआ मेरा मन था कोई मिल ना रहा था सहारा - २
लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे मिल ना रहा हो किनारा
मिल ना रहा हो किनारा
उस लड़खड़ाती हुई नाव को जो किसी ने किनारा दिखाया
ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है, मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम
जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाये तरूवर की छाया ……………
[कृप्या साईड बार में दिये गये पोल में भाग लेकर अपनी पसंद बतायें, धन्यवाद।]
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Comments
it is excellent no comments are desired for such versatile composing, the vibrations ,it generates and the tranquility it perculates it self is a comment on the poetic endeavours of the geniuses of those who wrote ,composed and sung it and gretest is the efforts of you who made it available to me let your endeavours continue perinnially and all blessins and peace as all as cited in the song comes to your fold please respond.
dhiresh pant
thanks for your comments….
if you want to contact sharma bandhus then you can contact on sharmabandhu2000@gmail.com













बहुत खूब! मजा आ गया!