चंदन दास की आवाज में सुनियेः मैंने मुँह को कफन में छुपा जब लिया
आप में से अगर किसी को दूरदर्शन के जमाने की याद हो तो ये भी याद होगा कि उसमें अक्सर गाहे-बगाहे एक शख्स की महफिल जमती थी या कह लीजिये उसके गीत और गजल बजते थे। जी हाँ, सही पहचाना मैं चंदन दास की बात कर रहा हूँ। गीतों के अंदाज में गायी उनकी गजलें आसानी से हर किसी को पसंद आ जाती है, संगीत तो साधारण होता था लेकिन गजलों का सलेक्शन था जो वास्तव में पसंद आता था।
ऐसी ही एक गीत-गजल आज पहली बार सुनी (अगर पहले सुनी हो तो याद है), अंतिम अंतरे को ध्यान से सुनियेगा।
मैंने मुँह को कफन में छुपा जब लिया
तब उन्हें मुझ से मिलने की फुरसत मिली
हाले दिल पूछने जब वो घर से चले
रास्ते में उन्हें मेरी मय्यत मिली
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मैंने मुँह को कफन में छुपा जब लिया
तब उन्हें मुझ से मिलने की फुरसत मिली
” बहुत सुंदर ग़ज़ल पहले भी सुनी थी और आज फिर से सुन कर याद ताजा हो आई…”
Regards