मिर्जा गालिब १: हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे

अगली कुछ पोस्टों की श्रृंखला में बात करेंगे मिर्जा गालिब की, उनकी लिखी कुछ गजलों की, और सुनेंगे कुछ गजलें। मिर्जा गालिब के ऊपर वैसे तो पहले ही बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है लेकिन फिर भी अपनी तरफ से उन पर लिखने की कुछ गुस्ताखी तो हम भी कर ही सकते हैं।

गालिब का असली और पूरा नाम था मिर्जा असदुल्लाह बैग खान, जो दिसम्बर २७, १७९७ में कला महल आगरा में पैदा हुए थे। उनके पूर्वज टर्की से आये थे, कुछ लोग गालिब की पैदाईश दिसम्बर की जगह जनवरी की मानते हैं। उनके पिता अबदुल्लाह बैग खान अलवर के राव राजा बख्तावर सिंह की तरफ से युद्ध में लड़ते हुए जन्नतनशीं हुए थे। उनके चचाजान नशरुल्लाह बैग खान ने उनकी परवरिश का जिम्मा लिया लेकिन गालिब जब ८ साल के हुए तो उनका भी इंतकाल हो गया।

उनका निकाह १८१० में, नवाब इलाही बख्श खान की बेटी उमराव बेगम के खानदान में १३ साल की उम्र में हुआ, उनकी सात संताने हुईं लेकिन सभी का बहुत छोटी ही उम्र में इंतकाल भी हो गया। और यही दर्द उनकी कई गजलों में देखने को भी मिलता है। वो धर्म के मामले में ना कट्टरपंथी थे और ना ही नमाज वगैरह पढ़ते थे और ये बात उस दौर के कई कट्टरपंथियों को खटकती भी थी। उनकी ये भावनायें भी कई गजलों में महसूस होती हैं।

गालिब का इंतकाल १५ फरवरी, १८६९ में दिल्ली में हुआ। पुरानी दिल्ली के चाँदनी चौक इलाके में गली कासिम जान, बल्लीमारन का घर जहाँ वो रहते थे आज गालिब मैमोरियल के रूप में जाना जाता है।

गालिब का मतलब होता है प्रबलशाली यानि डोमिनेंट (dominant) और असद का मतलब होता है शेर (lion) जो कि उनका सबसे पहला तख्खलुस (pen-name) भी था। फिर एक दिन जब उन्होंने किसी और शायर का लिखा ये शेर (couplet) पढ़ा -

असद उस जफा पर बुतों से वफा की
मेरे शेर शाबास रहमत खुदा की

इस शेर को लिखने वाले शायर का तख्खलुस असद था और पढ़ने में आता है कि इस शेर को सुनकर गालिब का कहना था कि अगर मैंने असद नाम से लिखना जारी रखा तो लोगों को कहीं ये ना लगे कि ये बेहतरीन शेर मेरा लिखा है। जबकि जिसने ये लिखा है वो वास्तव में खुदा की रहमत डिसर्व करता है और उनका लिखा मेरा समझने पर मेरे लिये किसी लानत से कम नही इसलिये उन्होंने अपना तख्खलुस रखा ‘गालिब’।

ये वाकया काफी है इस बात को सिद्ध करने के लिये -

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अंदाजें बयाँ और

गालिब के बारे में बातें अगली पोस्ट में जारी रहेंगी
, अब कुछ उनका लिखा सुनते हैं। पहले गुलजार की आवाज में कुछ भूमिका फिर जगजीत सिंह के स्वर में चंद लाईनें। अंत में फिर जगजीत सिंह की आवाज में गालिब की लिखीं चंद लाईनों से पहले उद्धव की एक छोटी सी रचना।

और बाजार से ले आये अगर टूट गया
सागरे जम से मेरा जामे सफाल अच्छा है।
उनके देखे से जो आ जाती है मुँह में रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
देखिये पाते है पुसाख बुतों से क्या फैज
इक ब्रहामण ने कहा है कि ये साल अच्छा है।
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल को खुश रखने को ‘गालिब’ ये ख्याल अच्छा है।

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे:

जगजीत सिंह का मिरॉज के लिये गाया ‘इक ब्रहामण ने कहा है कि ये साल अच्छा है’ यहाँ इस पोस्ट पर आप पूरा पढ़ और सुन सकते हैं।

[पहेली क्रमांक ९ का सही जवाब था मिर्जा गालिब और इसका सही जवाब दिया था दिनकरजी, पारूल और प्रदीप ने। भाग लेने के लिये आप तीनों और निर्मला कपिलाजी का बहुत बहुत शुक्रिया।]

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Comments

दिल्ली गालिब को भूली पर आपने याद रखा और यह उम्दा लेख दिया। आगे भी जारी रखें। बधाई।

ग़ालिब के बारे में लिख रहे हैं.बहुत अच्छा . इन मशहूर शख्सियतों के बारे में जितना लिखा जाये कम है. इंतज़ार है आगे के लेखों का.

achcha laga lekh….jari rakhiye.

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