आज के इस इंसान को ये क्या हो गया

मेरे आल टाईम पसंदीदा कवि हैं “कवि प्रदीप” यानि रामचंद्र बरायनजी द्विवेदी। आज पेश है इन्हीं की एक बेहतरीन रचना जो आज के दौर को बहुत सटीक बयाँ करती है। ये कविता (गीत) इन्होंने फिल्म “अमर रहे ये प्यार” के लिये लिखा था। ये फिल्म रीलिज हुई थी सन् 1963 में। इसमें मुख्य भूमिका निभायी थी नलिनी जयंवत, राजेन्द्र कुमार और नंदा ने। फिल्म का संगीत था सी. रामचन्द्र का, फिल्म में इस गीत को स्वयं कवि प्रदीप ने गाया था।

मेरे पास इसका ओरिजिनल यानि खुद कवि प्रदीप का गाया हुआ गीत नही है, ये जो गीत पेश है इसे विपिन सचदेवा ने गाया है। लेकिन आप इस गीत की एक एक लाईन को ध्यान से सुनियेगा जिसमें आज के दौर को शब्दों के रूप में पेश किया गया है। उनके अन्य गीतों की ही तरह आसपास के समाज को आधार बनाकर लिखा गया है ये गीत भी।

मेरे लिये गीत गाता चल में नये साल की शुरूआत इससे बेहतर नही हो सकती, आप सभी संगीत प्रेमियों को नये साल की संगीतमय शुभकामनायें।

आज के इस इंसान को ये क्या हो गया
इसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया
कैसी ये मनहूस घड़ी है
भाईयों में जंग छीड़ी है
कहीं पर खून कहीं पर ज्वाला
जाने क्या है होने वाला
सबका माथा आज झुका है
आजादी का जुलूस रूका है
चारों ओर दगा ही दगा है
हर छूरे पर खून लगा है
आज दुखी है जनता सारी
रोते हैं लाखों नर नारी
रोते हैं आंगन गलियारे
रोते आज मोहल्ले सारे

अब ज्यादा पढ़कर नही सुनकर मजा लीजिये

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Comments

भैये प्रदीप जी की आवाज़ होती तो मजा और होता । पर प्रदीप जी की वाक़ई बात ही निराली है । उनकी लेखनी और गायकी को नमन है ।

कवि प्रदीप की आवाज़ में ये अद्भुत गीत यहाँ सुनें :

http://kisseykahen.blogspot.com/2008/05/blog-post_17.html

कितना बदल गया इंसान…प्रदीप जी ने गाया था…कभी रेडियो सिलोन वाले सुनावाते रहते थे…साहिर साहब का लिखा गीत भी कम नहीं था …..ये महलो ये तख़्तों ये ताजों की दुनियाँ…ये दुनिया अगर मिल भी जाय तो क्या है…या मुकेश का गाया गीत…आसमा पे है ख़ुदा और ज़मी पे हम आजकल वो इसतरफ़ देखता है कम..क्या याद दिला दिया आपने..बहुत बहुत शुक्रिया मित्र.

बहुत सुंदर गीत…. सुन कर आनंद लिया।

Beautiful!

pardeep ji ko dil se nman. inkey har geet ka aanand liya ja sakta hai,kisi other kavi ke nahi

कितना बदल गया इंसान…प्रदीप जी ने गाया थाआपने..बहुत बहुत शुक्रिया

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