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एक ब्रहामण ने कहा है कि ये साल अच्छा है

November 15th, 2008 | 7 Comments | Posted in Gazals

शायरों की जमात ही ऐसी होती है कि वो सपने देखती है, उन सपनों को फिर बुनती है और फिर तैयार होती है एक नज्म, एक गजल जिसे सुनकर हम कह उठते हैं, वाह ये गजल अच्छी है।

आज के दौर में जहाँ आपसी मतभेद बड़ रहे हैं, ताकतवर लोग जुल्म पर जुल्म करने में लगे हैं। उन घरों की संख्या बढ़ने लगी हैं जिन्हे हर रोज का चूल्हा नसीब नही होता। ईकोनॉमी की मार ऐसी पड़ रही है कि लोग घर से बेघर हो रहे हैं। अगले साल चुनाव होने वाले हैं और ऐसे में वो लोग सड़को में उतरने लगेंगे जो बड़े बड़े वादों को करने में महारत लिये हैं, इन सबके बावजूद वो लोग यही कहेंगे – ये साल अच्छा है।

अगर अभी तक भी आप नही समझे तो बता दूँ, आज आपके नजर पेश है जगजीत सिंह की गायी हुई गालिब (या गुलजार ????) की गजल जो इन्होंने मिरॉज (Mirage) नामके एलबम के लिये गायी थी। मेरी भी यही तमन्ना और आरजू है कि इस गजल में लिखी हर एक लाईन आने वाले साल या सालों में सच हो जाय। वाकई में गालिब/गुलजार का है अंदाजें बयाँ और,

एक ब्रहामण ने कहा है कि ये साल अच्छा है
जुल्म की रात बहुत जल्दी ढलेगी अब तो
आग चूल्हे में हर एक रोज जलेगी अब तो

भूख के मारे कोई बच्चा नही रोयेगा
चैन की नींद हर एक शख्स यहाँ सोयेगा
आंधी नफरत की चलेगी ना कहीं अब के बरस
प्यार की फस्ल उगायेगी जमीं अब के बरस

है यकीन अब ना कोई शोर शराबा होगा
जुल्म होगा ना कहीं खून खराबा होगा
ओस और धूप के सदमे ना सहेगा कोई
अब मेरे देश में बेघर ना रहेगा कोई

नये वादों का जो डाला है, वो जाल अच्छा है
रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है
दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है


01 EK BRAHMAN NE K…

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7 Responses to “एक ब्रहामण ने कहा है कि ये साल अच्छा है”

  1. Raaj Says:

    बहुत सुन्दर गजल है पढ़ने में भी सुनने में भी, धन्यवाद।

  2. amar Says:

    बहुत अच्छी रचना है। पर न तो ये ग़ज़ल है न ही ग़ालिब की है। ग़ालिब की कुछ
    मशहूर पँक्तियों का प्रयोग ज़रूर हुआ है इसमें।

  3. Tarun Says:

    @अमरजी, मेरे ख्याल से ये गुलजार ने लिखी है लेकिन मेरे पास इसका कवर नही है इसलिये गालिब का नाम आने से ये लिखा है। हो सकता है कोई जिसे मालूम हो वो कन्फर्म कर दे कि ये गुलजार की लिखी हुई लाईनें हैं। और अगर ऐसा है तो भी मेरे लिये तो गुलजार का भी है अंदाजें बयाँ और।

  4. दिनकर Says:

    किसी भी मशहूर कविता में से एक या दो लाइन लेकर नई गज़ल/नज़म लिखा जाना भी एक पुरानी विधा है. जैसे गुलजार साहब ने गालिब की गज़ल से एक लाइन लेकर फिल्म मौसम के लिये दिल ढूंढता है फिर वही फुरसत के रात दिन लिखा था या मज़रूह साहब ने फैज़ की नज़्म की एक लाइन लेकर तेरी आंखों के सिवा दुनियां में रक्खा क्या है लिखी थी.

    जिसने भी लिखा होगा, बहुत अच्छा लिखा है.

  5. LOVELY Says:

    अफ़सोस पुष्टि नही कर सकती की गुलजार जी की ही है या नही …मेरे पास MP3 फोर्मेट में थी.

  6. दिनेशराय द्विवेदी Says:

    इक बिरहमन ने कहा है ये साल अच्छा है, ग़ालिब की मशहूर और गहरे अर्थों वाली गज़ल है।
    यह रचना भी अच्छी है। लेकिन इस के अर्थ सतही हैं, ग़ालिब की तरह गहरे नहीं। वैसे ग़ालिब तो ग़ालिब है कोई और कैसे हो सकता है।

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  1. मिर्जा गालिब १: हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे  

बड़ी देर कर दी, मेहरबाँ आते-आते

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