मधुशाला: सुन कल-कल छल-छल मधुघट से
सन् 1935 में 135 रूबाईयों (चार लाईन की छंद टाईप कविता) को अपने में सिमटी एक किताब छपी थी, नाम था मधुशाला और इसे लिखा था हरिवंश राय बच्चन ने। इसी मधुशाला ने हरिवंश राय बच्चन को नाम और प्रसिद्धि दोनों दिलाया। मधुशाला एक ट्राईओलोजी (Triology) का हिस्सा थी जो इन्होंने उमर खय्याम की रूबाईयों से प्रेरणा पाकर लिखी थी। इस Triology की अन्य किताबें मधुबाला (1936) और मधुकलश (1937) को वो मुकाम हासिल नही हुआ जहाँ मधुशाला जा बैठी थी।
आज भी मधुशाला किसी परिचय कि मोहताज नही है, और इस मधुशाला को और भी मादक बना दिया मन्ना डे की आवाज ने। कालेज के दिनों में पसंदीदा एलबम में से एक होता था मधुशाला, कितना ही सुन लो मन नही भरता था। इसके बारे में एक बात सुनी थी, शायद अपवाह जिसकी वजह से कुछ समय के लिये एक विवाद भी खड़ा हुआ था। किसी ने कहा था कि मधुशाला बच्चन ने नही बल्कि किसी और ने लिखी थी, जिसकी माली हालत ऐसी नही थी कि वो उसे छपवा पाता। मुझे लगता है बच्चनजी की लिखी अन्य कृतियों को उतनी प्रसिद्धि ना मिल पाने या लोगों द्वारा उतना पसंद नही किये जाने की वजह से इस बात को किसी ने उड़ाया हो। खैर ये तो सुनी सुनायी बातें थी, इसन्हें छोड़िये और मधुशाला की कुछ रूबाईयाँ पढ़िये फिर उसके बाद मन्ना दा की आवाज में इसे सुनकर कल-कल छल-छल आप भी गुनगुनाईये।
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।* * *
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।।चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
‘दूर अभी है’, पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।* * *
सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।* * *
धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मस्जिद, गिरजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला’
‘और लिये जा, और पीये जा’, इसी मंत्र का जाप करे’
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।
और ये अंतिम कुछ लाईनें मेरे लिये -
स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।।अब मन्ना डे की आवाज में सुनिये तुम भी ये मधुशाला
MAD01.mp3
अगर आप मधुशाला की पूरी 135 रूबाईयां पढ़ना चाहते हैं तो यहाँ पढ़ सकते हैं।


November 7th, 2008 at 10:52 am
प्रथम पद स्वयं हरिवंशराय बच्चन के स्वर में है । ‘सुनिये तुम भी’ नहीं। ‘सुनो तुम भी’ अथवा ‘सुनिए आप भी’। जल्दी में दोहराया नहीं, लगता है।
November 7th, 2008 at 11:46 am
मधुशाला की हर पंक्ति लाजवाब है ..इसको सुनवाने का शुक्रिया
April 3rd, 2009 at 8:33 pm
waah mazaa aa gayaa …Manna Dey ki awaaz pahchaan mein nahi aa rahi…kisi aur ki lagti hai…:) pataa nahi kyun
June 16th, 2009 at 1:13 am
madhushla pedh kar or sun kar bahut anand aaya.